निर्दयता की हद को लांघती मनोविकारी प्रवृत्तियां


लेखक:डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग,
सिदो कान्हू मुर्मू विवि, दुमका।

झारखण्ड देखो डेस्क : यह बात कहना जितना ही दुःखद व निंदनीय है उससे कहीं ज्यादा चिंतनीय विषय भी है कि वर्त्तमान समाज में घटती अनैतिक व अमानवीय घटनाएं सामाजिक मान-मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघ रही है। कहना ना होगा कि आज शायद ही ऐसा कोई घर ,परिवार या समाज होगा जो भय, तनाव, असुरक्षा आदि के नकारात्मक अनुभवों से ना गुजर रहा हो। अखबारों की सुर्खियों में छपी दुष्कर्म, हत्या, आत्महत्या, अपराध, शोषण, आदि की खबरें यह कहने को काफी है कि समाज में ना केवल नैतिकता का पतन हो रहा है बल्कि सामाजिक मानकों के कमजोर या असंवेदनशील होने सेे पाशविक प्रवृत्तियां भी बेलगाम होने लगी है जो बेझिझक क्रूरता की हद को पार करती जा रही है। अबोध बालिका हो या महिला उसके साथ दिन दहाड़े दुष्कर्म कर जघन्य हत्या किया जाना , रिश्तेदारों के द्वारा मामूली से जमीन विवाद पर शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाना, मामूली से बात पर गोली चला देना, आग लगा देना, सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाना , अंधविश्वासी डायन के नाम कमजोर ,गरीब व विधवा महिलाओं को नंगा कर पूरे गांव घुमाना व मैला खिलाना, शराब के नशे में किसी के बहु-बेटी की इज़्ज़त से खेलना, बदले की भावना से सामूहिक बलात्कार करने की हिम्मत दिखाना, जबरदस्ती का प्रेम रिश्ता बनाने की जिद्द करना व ना मानने पर तेजाब फेंकना, इमोशनल ब्लैक मेल करना, दबंगई दिखाना आदि सारी घटनाएं इंसानियत के माथे लगने वाला एक अमिट कलंक है जिसपर नियंत्रण पाना अब भी बाँकी है। अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों ऐसी क्रूर घटनाओं की लड़ी लगती चली जा रही है? आखिर क्यो मनोविकारी प्रवृत्तियां इतना हद तक अनर्थ करने का दुस्साहस दिखाती है? क्या उन्हें कानून व पुलिस प्रशासन का तनिक भी डर नही? क्या उन्हें इस बात की चिंता नही होती है कि ऐसा होने से ना केवल उसकी जिंदगी बर्बाद हो सकती है बल्कि इसका घर-परिवार भी उस घिनौनी आग में जा झुलस सकता है? क्या ऐसे लोगो पर मृत्यु मुलप्रवृत्तियां यानी विध्वंसक प्रवृत्तियां हाबी हो चली है? क्या ये सोशल मीडिया की नकल है या दिखावे की नई जीवन शैली है या नव उदारवादी विचारधारा का कोई विकृत भौतिकवादी प्रभाव है या सरकार के प्रति दिखाया जाने वाला असंतोष या निराशाजनक भाव है जो युवाओं को उम्मीद के विपरीत विषादों की जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ रहा है? आखिर वो कौन-सी प्रमुख वजहें है जो अमानवीय घटनाओं के ग्राफ को लगातार बढ़ाता ही चला जा रहा है? नेशनल क्राइम बोर्ड हो या अपराध नियंत्रण शाखा या पुलिस थाना सभी जगह यह सवाल बना हुआ कि आखिर कब उन मनोविकारी प्रवृत्तियों के क्रूर कृतियों पर नियंत्रण पाया जाएगा?
समाज मनोविज्ञान की माने तो इन पाशविक प्रवृत्तियों में बढ़ने के कारणों में एक कारण सामाजिक मानकों का कमजोर होना भी है जहाँ इड जो आनंद के नियम से प्रभावित होता है बेलगाम हो चला है जहां वो सभी गैर समाज विरोधी व अतृप्त इच्छाओं की पूर्ती झटके में कर लेना चाहता है। जबकि व्यवहारवादी दृष्टिकोण की मानें तो यह दोषपूर्ण समाजीकरण का प्रभाव है तो गलत व्यवहारों का शिक्षण है जो पुनर्बलन का शिकार होकर ऐसी विभत्स घटनाओं को अंजाम दे रहा है जो यह पुनर्बलन अभिभावकों से लेकर शिक्षक व समाज से मिलता है। अर्थात जहाँ जिन व्यवहारों पर शुरुआत में अंकुश परिवार, समाज , क़ानून व प्रशासन से लगना चाहिए वो वहां येन-केन-प्रकारेण छूट जाता है जो आगे चलकर परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए परेशानी का सबब बनता है। कहीं द्वंद्ध मानसिकता है, तो कहीं अचेतन की कहानी। तो कहीं कुव्यवस्था व विद्रोहात्मक सामाजिक वातावरण से उतपन्न असंतोष , निराशा है जो आक्रामकता को जन्म देता है जिसके आगोश में आकर लोग हत्या या आत्महत्या करते है।

Post Author: Sikander Kumar

Sikander is a journalist, hails from Dumka. He holds a P.HD in Journalism & Mass Communication, with 12 years of experience in this field. mob no -9955599136

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