
दुमका नगर परिषद् के उपाध्यक्ष पद के लिए होनेवाले चुनाव को लेकर बुधवार को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विनोद कुमार लाल ने अपना नामांकन दाखिल किया। नामांकन दाखिल करने के बात विनोद कुमार लाल ने खुटाबांध स्थित अपने निजी आवास में मीडिया से मुखातिब हुए और संवाददाता सम्मेलन के दौरान अपनी मन की बात कही। विनोद लाल ने कहा कि 15 नवम्बर 2000 में झारखण्ड राज्य के गठन के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है कि नगर निकाय के चुनाव में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद को दलीय प्रणाली के हवाले कर दिया गया है। चूँकि झारखण्ड की उपराजधानी दुमका में अध्यक्ष पद को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया है तो ऐसी स्थिति में उपाध्यक्ष का पद ही पुरुषों के लिए लड़ने को रहा है। उन्होंने कहा कि 2013 में जो चुनाव हुए थे उसमे दलीय प्रणाली नहीं थी और यहाँ तक कि उपाध्यक्ष का पद पार्षदों द्वारा मनोनीत किया गया था, जिसमें यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे चुना गया और मुझे इस खूबसूरत और शांत मिजाज वाली उपराजधानी के लोगों की सेवा करने का अवसर मिला। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पिछले 5 साल में मैंने अपने प्रयासों से दुमका की जनता के लिए जो कुछ भी किया उसे मैं पर्याप्त नहीं मानता। ऐसा इसलिए कि हमारी स्थिति सीमित थी। फिर भी हमने विकास के लिए जब कड़े फैसले लेने शुरू किये तो एक षड्यंत्र के तहत मुझपर अविश्वास का प्रस्ताव लाया गया, लेकिन उनकी मर्जी असफल रही और हमारे राजनीतिक विरोधी को हार का सामना करना पड़ा। फिर भी आज की तारीख में हमें उनसे कोई गिला-शिकवा नहीं है, मैं सिर्फ दुमका का विकास चाहता हूँ और इसलिए पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता।
उन्होंने कहा कि पिछले 5 वर्षो में हमने शहर के विकास संबंघी कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को पारित करवाया लेकिन ख़राब गुणवत्ता की वजह से अधिकांश कार्य धरातल पर नहीं आ पाए। मुझे इस बात का काफी दुःख है कि जितना होना चाहिए था उतना इसलिए नहीं हो पाया कि हमारे अधिकार सीमित थे लेकिन हमने कभी भी अपनी मेहनत और ईमानदारी से समझौता नहीं किया, यह बात दुमका के लोग अच्छी तरह से जानते है। अब इस बार चुनाव चूँकि दलीय आधार पर होना है तो हमने भी दुमका की जनता के आशीर्वाद से अपनी किस्मत आजमानी चाही है लेकिन मेरा किसी भी दल से चूँकि कोई संबंध नहीं है तो मेरे लिए बेहतर यही है कि इस चुनाव को दुमका की जनता की सेवा मानकर एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा जाये। उन्होंने यह भी कहा कि एक स्वतंत्र उपाध्यक्ष के रूप में मैं जितनी सेवा यहाँ की जनता की कर सकता हूँ, एक दलीय प्रत्याशी नहीं कर सकता क्योंकि उसपर उसके दल के बड़े लोगो का दवाब हमेशा बना रहेगा और वह व्यक्ति जनता से अधिक अपने दल के हितों के बारे में ही सोचेगा। राजनीतिक में यह आज एक आम बात है, एक दल दूसरे से ताल-मेल नहीं बैठा पाते और परिणाम यह होता है कि वे आपस में ही लड़ते रहते है और विकास कार्य रुक जाता है। उन्होंने कहा कि मैं अपना घोषणापत्र जल्द ही पेश करूँगा और इसी आशा और उम्मीद के साथ लोगों का आशीर्वाद चाहूँगा।








