
रांची। पांच राज्यो के आए चुनाव परिणाम और भाजपा की हार से यह चर्चा आम हो गई है कि क्या अब सचमुच झारखण्ड के मुख्यमंत्री का चेहरा बदल जायेगा। वैसे यह चर्चा भाजपा के केंद्रीय अध्यक्ष अमित शाह के झारखण्ड दौरे के पहले और बाद भी खूब हुई थी कि इन 5 राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद झारखण्ड में बड़ा उलटफेर हो सकता है, लेकिन अब जब भाजपा खासकर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में सरकार गवां चुकी है तो एक बार फिर यह चर्चा जोर-शोर से है कि झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का क्या होगा ? ये एक सवाल बन कर रह गया है।
झारखण्ड और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों का गठन एक साथ हुआ लेकिन सिर्फ इतना ही दोनों में समानता नहीं है बल्कि सामाजिक, भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टिकोंण से भी दोनों में बहुत समानता है। इसके अलावे चाहे बात आदिवासियों के सवाल का हो या फिर किसानों का या नक्सलवाद का, छत्तीसगढ़ में यह भी देखा गया कि ज्यादातर आदिवासी विधायक चुनाव हार गए। वजह है सरकार से नाराजगी। झारखण्ड में आदिवासी का एक पूरा खेमा सरकार से नाराज है। बात चाहे सीएनटी/एसपीटी एक्ट का हो या भूमिअधिग्रहण का या फिर पथलगढ़ी का। ये ऐसे मामले हैं जिसे विपक्ष ने मजबूती से उठाकर सरकार की ख़राब छवि खासकर आदिवासी मतदाताओ के मन में भर दिया है। जिसे पाटने में पार्टी के पसीने छूट रहे हैं।
इसलिए यह चर्चा आम है कि क्या भाजपा में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलकर 27 प्रतिशत आदिवासी वर्ग की नाराजगी थोड़ी कम करना चाहेगी ? पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कैबिनेट के मंत्रियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। कई जगह मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खुद रैलियों को संबोधित किया और झारखण्ड के विकास का हवाला देते हुए मतदाताओ को लुभाने की कोशिश की लेकिन कहीं से भी कोई फायदा नहीं हुआ। बल्कि परिणाम यह हुआ कि जहां-जहां सभा हुई वहां भाजपा पूरी तरह साफ़ हो गई।
झारखण्ड में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि पहले वो कई खेमों में बंटी थी लेकिन अब तस्वीर ठीक उसके उलटी है। सत्ता से दूरी ने कांग्रेस को एकजुट कर दिया है.. तो भाजपा खुद टुकड़ों में बंट गई है। झारखण्ड में भाजपा के नेताओं की सरकार से दूरी और छोटे कार्यकर्ताओं की अनदेखी ने पार्टी को अंदर से तोड़ दिया है। भाजपा प्रदेश कार्यालय में भी अब वैसे नेता अब कम दिखते हैं, जो तन मन और धन लगाकर पार्टी की सेवा में जुटे थे। क्योंकि लगभग 4 साल बीत जाने के बाद भी उन्हें इज्जत नहीं दी गई।
भाजपा में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने का काम अपने विकास के मॉडल वाले राज्य गुजरात में कर चुकी है। गुजरात में जब पाटीदार आंदोलन चल रहा था तो चुनाव से एक साल पहले आनन्दीबेन पटेल को बदलकर विजय रूपानी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था। झारखण्ड में भी आदिवासी नाराज हैं तो आशंका जाहिर की जा रही है कि रघुवर दास का चेहरा बदलकर कोई नया चेहरा को भाजपा आगे कर सकती है।
झारखण्ड में सरकार के कार्यप्रणाली के खिलाफ आक्रोश बढ़ रहा है। आदिवासी, पारा शिक्षक, ईसाई, स्टूडेंट्स, सेविका समूह के साथ-साथ कैबिनेट के मंत्री से लेकर सहयोगी आजसू भी आँखे तरेरे हुए हैं। ये सभी आक्रोश सरकार के लिए घातक हो सकती है। यह भी है कि संगठन की ओर से एक अंदरूनी रिपोर्ट भी तैयार कराई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि रघुवर दास के मुख्यमंत्री रहते चुनाव में जाना पार्टी के लिए घातक हो सकता है।








