दुमका:
मुंशी प्रेमचन्द जयंती की सिदो-कान्हू मुर्मु विश्वविद्यालय के स्नाकोत्तर हिन्दी विभाग में बुधवार को हर्षोउल्लास से मनायी गयी।
अध्यक्षता कर रहे हिन्दी विभागाध्यक्ष डा० विनय कुमार सिन्हा ने प्रेमचंद के रचनात्मक वैशिष्ठय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे मूलतः कृषक जीवन के रचनाकार थे। किसान की भूमि से कितनी आत्मीयता होती है इसका चित्रण वे रंगभूमि और प्रेमाश्रम में करते है। तत्कालीन किसानों पर ब्रिटिस साम्राज्यवाद ,बड़े एवं छोटे व्यापारियों आदि सबका भार था, इस बात को उन्होंने गोदान में दिखाया है कि छोटा किसान किस तरह क्रमश: भूमिहीन होकर मजदूर बनने पर विवश हो रहा है। इस प्रकार उन्होंने भारतीय जीवन के यथार्थ को अपनी विभिन्न रचनाओं में स्थान दिया है।
मुख्य अतिथि रूप में आये विद्यासागर सम्मान प्राप्त पुरातत्त्ववेत्ता पंडित अनूप कुमार वाजपेयी ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्राचीनकाल से ही मानव अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति विभिन्न कलाओं के माध्यम से करता आ रहा है, यथा – शैलचित्रों, भित्तिचित्रों, सांकेतिक लिपियों, मूर्तिकला, वास्तुकला इत्यादि।
कालान्तर में भाषा के पारिमार्जन के साथ-साथ उपाख्यानों-आख्यायिकाओं का उद्भव हुआ। आगे चलकर विभिन्न विधाएँ प्ररम्भ हुईं, यथा – श्लोक, काव्य, खण्ड-काव्य, नाट्यकाव्य, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा-वृत्तान्त इत्यादि।
प्रेमचंद ऐसे समय में पैदा हुए थे जब साहित्यिक रचनाएँ विशेषतः केवल मनोरंजन के लिये हुआ करती थीं। शुरूआत वहीं से करके उन्होंने लेखन का उद्देश्य ही परिवर्तित कर दिया। उन्होंने ऐसी क्रान्ति का श्रीगणेश किया जिसकी बदौलत आज हिन्दी साहित्य धरती पर खड़ा है।
पहले साहित्यिक रचनाएँ केवल कल्पनालोक में विचरण कर रही थीं। माटी की सोंधी गंध और नदी में बहते शीतल जल को अंजुली में भरकर उसके स्वाद से अवगत कराया।
समाज का सर्वाधिक उपेक्षित वर्ग, शोषित-पीड़ित वर्ग, अनपढ़ और अशिक्षित वर्ग इन सब को हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित करने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो सबसे पहले प्रेमचंद को।
साहित्य को जीवन की वास्तविकता से अवगत कराने का पुनीत कार्य किसी ने प्रारम्भ किया, वह प्रेमचंद है.
उनका रचना संसार भी बहुत विस्तृत है। उनका कहानी संग्रह कई भागों में मानसरोवर के रूप में हिन्दी साहित्य का पवित्र अवगाहन जनसमाज को कराता रहा है। उपन्यास के तो वे सम्राट् ही माने जाते हैं। उनका सम्पूर्ण साहित्य तत्कालीन परिवेष का यथार्थ चित्रण उपस्थित करता है।
उन्होंने कहा कि इतिहास में झांकते हुए प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का अध्ययन करते हुए पाया है कि समय-समय पर ऐसा कोई उन्नायक जन्म लेता है जो सभ्यता-संस्कृति के विकास को तीव्र गति प्रदान करता है।
आगे कहा कि जिस प्रकार वैदिक साहित्य से आगे चलते हुए लौकिक साहित्य को जनमानस तक पहुँचाने का कार्य वेदव्यास ने किया था, मैं समझता हूँ वह एक क्रान्तिकारी परिवर्तन का कार्य था। उसी प्रकार परिकथा से सम्बन्धित समृद्ध साहित्य को ; निर्धनता और अकिंचनता का दर्शन आपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद ने कराया। यह कार्य भी सांस्कृतिक विकास को तीव्रता प्रदान करने का ही कार्य है।
वे शतरंज के दौर में पैदा हुए पर बिगाड़ के डर से इमान की बात कहने से कभी नहीं कतराये। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि आज भी मुंशी वंशीधर जैसे दारोगा की आवश्यकता समाज को है।
प्रेमचंद की पूस की रात भुलाये नहीं भूलती। मानवीय संवेदना प्राणीमात्र की संवेदना में किस प्रकार परिवर्तित होती है इसकी गवाह है पूस की रात।
जब भारी हलकू सबकुछ खोकर अपने कुत्ते जबरे से आलिंगनबद्ध हो जाता है तो पूस की रात मानव एवं पशु की वर्गभिन्नता से ऊपर उठाकर प्राणीमात्र की संवेदना रह जाती है।
प्रेमचंद को शत-शत नमन करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य जगत में कथाकार-साहित्यकार के आगमन की शुभकामना करता हूँ क्योंकि साहित्य से, और साहित्य में, कायाकल्प प्रेमचंद से ही सम्भव है।
मौके पर विभाग के शिक्षक डॉ0 अजय शुक्ल, प्रो0 सुजीत कुमार सिंह, प्रो0 दिव्य पूजा, शोधार्थी रूपम कुमारी, मुकेश कुमार एवं विभाग के अन्य छात्र-छात्रा मौजूद थे।
जयन्ती अवसर पर नारायण मंडल, आलोक मनोहर टुडू, डोली कोल, ऋतम्भरा, नीतू, कंचन माला, विष्णु, इमरसन आदि छात्र-छात्राओं ने समाज में व्याप्त अन्धविश्वास एवं भेदभाव पर आधारित प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” के नाट्य मंचन की आकर्षक प्रस्तुति दी।
प्रेमचंद की पूस की रात भुलाये नहीं भूलती- अनूप कुमार वाजपेयी








