
झारखण्ड देखो डेस्क :झारखण्ड पीपुल्स पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष व घाटशिला से पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने कहा झारखंड राज्य की स्थापना के बाद 20 साल पुरी हुई। इस कालखंड में अविभाजित बिहार में सन् 2000 से 2019 तक झारखंड में पांच बार विधानसभा की चुनाव हुई। खंडित जनादेश के कारण 11वाँ बार सरकार बनी और तो और तीन बार राष्ट्रपति शासन लागु हुई,फिर भी विडम्बना यह है कि दो दशकों में भी झारखंड की तस्वीर और झारखंडियों की तकदीर नहीं बदली ? 20 साल की 20 सवाल ?
20 वाँ वर्ष गाँठ पर समीक्षात्मक राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे है- झारखंड राज्य निर्माताओं में एक- सूर्य सिंह बेसरा ”
भारत स्वतंत्रता संग्राम में जो भूमिका” आजाद हिन्द फौज ” की रही है; वही भूमिका पाँच दशक पुरानी झारखंड आन्दोलन में ” ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन “( आजसू) की है; जो 72 घंटे झारखंड बंद की आहूत से झारखंड की राजनीतिक दशा और दिशा ही बदल गई, उसकी परिणामस्वरूप 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की कार्यकाल में झारखंड आन्दोलन के इतिहास में पहलीबार केन्द्र सरकार के साथ आजसू की दिल्ली में ” झारखंड वार्ता ” सम्पन्न हुई थी, तत्पश्चात काँग्रेस सरकार की पहल पर ” झारखंड विषयक समिति ” गठित हुई थी। उसके बाद से ही झारखंड राज्य निर्माण के दिशा मे कार्य प्रशस्त हुई। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है। परन्तु यह भी सच है कि केन्द्र में सत्ता पर आसीन काँग्रेस सरकार ने 1993 में झारखंड राज्य के बदले ” परिषद और रिश्वत ” ही दिये। आखिरकार सन् 2000 में केन्द्र में जब भाजपा शासित अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ” बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक 2000″ को लोकसभा और राज्यसभा से पारित किया। इस प्रकार अंततोगत्वा ” उलगुलान के जनक भगवान बिरसा मुंडा ” की जयन्ती के अवसर पर यानि 15 नवम्बर 2000 को भारत देश का 28 वाँ राज्य के रूप में झारखंड बना।
सन् 2000 मे अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्रित्व काल में एक साथ तीन राज्य बने, क्रमशः झारखंड उत्तराखंड और छत्तीसगढ। झारखंड राज्य के लिए विडम्बना कहा जाय या दुखद आश्चर्यजनक। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि 20 वर्षों के कालखंड में छत्तीसगढ और उत्तराखंड उत्तरोत्तर बेहतर होते गये और इसके बिपरीत झारखंड बद से बदतर होते गयी। धनी झारखंड गरीब होते गये। सन् 2000 में झारखंड राज्य का पहला बजट सरप्लस था और हाल फिलहाल की बजट घाटे की रही है। वर्तमान सरकार की तो खजाना ही खाली है । झारखंड राज्य भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है। शौचालय से लेकर सचिवालय तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। मंत्री से लेकर संत्री तक सभी भ्रष्टाचार में संलिप्त है। मानो झारखंड में सब कुछ बिकाऊ है; टिकाऊ कोई नही। झारखंड वो राज्य है- जहाँ खोदोगे वहीँ खनिज और जहाँ खोजोगे वहीं भ्रष्टाचार “।
झारखंड राज्य कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 3 करोड़ 30 लाख है; उनमें से अनुसूचित जन जातितों की अनुपातिक आबादी केवल 26 प्रतिशत है। विधानसभा की कुल 81 विधायकों की कुल सीटों में से एस टी के लिए मात्र 28 सीटें सुरक्षित है। कहने को तो झारखंड आदिवासी राज्य है, चुँकि राज्य के 24 जिलों में से 13 जिले भारत का संविधान के पाँचवीं अनुसूची के अन्तर्गत आते है।
अगर हम चर्चा करें 20 वर्षो की कालखंडों का- तो आप जरूर आश्चर्यचकित होगें। नि:संदेह ने भाजपा ने झारखंड राज्य दिया और राजपाट भी किये। बिहार से झारखंड राज्य अलग होते ही भाजपा के हाथों में सत्ता का बागडोर मिला। बाबूलाल मरांडी राज्य के पहला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल हुई। उनकी शासनकाल तीन साल तक रही। मरांडी को फजीहत कर उनकी सरकार को अपदस्थ किया गया और उन्हीं की पार्टी के अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बन बैठे। उनके हाथों में तीन बार कुल सात वर्षो तक शासन का बागडोर सौंपा रहा। भारतीय जनता पार्टी के ही रघुवर दास सरकार ने 2014 से 2019 तक पहलीबार गैर आदिवासी मुख्यमंत्री पूर्ण बहुमत के पाँच साल की शासनकाल पुरा किये। इस प्रकार 20 वर्षो के अंतराल में अकेले भाजपा की सरकार 15 वर्षो तक रही। बाकि बचे पाँच साल का शासनकाल झारखंड मुक्ति मोर्चा, काँग्रेस और राजद की रही है। झामुमो के सुप्रीमो शिबू सोरेन अल्पकालीन तीन बार मुख्यमंत्री बने और उनके सुपुत्र हेमंत सोरेन को दो बार मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। इस बार झामुमो कांग्रेस की मिलीजुली सरकार है। सन् 2006 में जरा हम पीछे की ओर झाँके तो याद दिलायेगी- वो भ्रष्टाचार की कड़ी जो विश्व रिकॉर्ड बनायी है। न दल न बल बिल्कुल निर्दल- मधु कोड़ा निर्दलीय विधायक को झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस की मिलीभगत से मुख्यमंत्री दो वर्षो तक बना दिया गया और उन्होंने साढ़े चार हजार करोड़ रुपए की घोटाले कर भ्रष्टाचार का विश्व रिकॉर्ड बना दिया।
झारखंड की विडम्बना यह भी है कि जो राजनीतिक दल आज सत्ता पक्ष में है,कल वे विपक्ष में थे और जो आज विपक्ष में है वो कल सत्ता पक्ष में थे। और तो और वे दोनों ही पार्टियाँ सत्ता की राजनीति के लिए एक दुसरे के लिए पूरक रहे है। यानि राजनीतिक दुश्मनी हरगिज नहीं और सत्ता के लिए मिलीजुली सरकार बनाने के लिए कोई परहेज नहीं। चुँकि भाजपा और झामुमो 18 – 18 महिनों की सरकार बना चुकी है।
कुल मिलाकर 20 वर्षो में झारखंड राज्य में केवल सत्ता की परिवर्तन हुई; व्यवस्था में कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुई। अब 20 साल में 20 सवाल उठाना लाजिमी है- 1- झारखंड राज्य किसी की अनुदान से नहीं प्राप्त हुई है। बल्कि पचास सालों की झारखंड के जनमानस की उलगुलान और शहीदों के बलिदान से बनी है, परन्तु करीब 70 हजार झारखंड आन्दोलनकारियों की पहचान और मान सम्मान का क्या हुआ ? चिन्हितकरण आयोग का पुनर्गठन कब होगी ?
2- संविधान के अनुच्छेद- 16(3) के मातहत संसद द्वारा झारखंड राज्य के लिए ” आन्ध्रप्रदेश के लिए विशेष उपबंध, अनुच्छेद- 371(घ) के तर्ज पर ” स्थानीय नीति ” कब निर्धारित होगी ? 3- झारखंड सरकार द्वारा 11 नवंबर को विधानसभा में सर्व सम्मत से पारित संकल्प प्रस्ताव ” सरना आदिवासी धर्म ” कोड संविधान के अनुच्छेद- 25 के तहत 2021 की जनगणना के पहले कब अनुच्छेद- 368 के तहत संविधान संशोधन होगी ?
4- संविधान के 8 वीं अनुसूची के अंतर्गत संताली भाषा को तत्कालीन भारत सरकार ने 22 दिसंबर 2003 में मान्यता प्रदान की है, 17 साल बीत चुकी है- कब लागु होगी ?
5- संविधान के अनुच्छेद- 350(क) के मातहत ” मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य है ” यह शिक्षा नीति देश के प्रायः सभी राज्यों में लागु है;
झारखंड राज्य में कब लागु होगी ?
6- झारखंड के तत्कालीन सरकार ने 2011 में संविधान के अनुच्छेद- 345 346 347 मे प्रावधानों के अनुरूप संताली मुंडारी हो कुड़ुख खाड़िया खोरठा नागपुरी कुरमाली पंचपरगनिया के साथ साथ उर्दू समेत बंगला उड़िया को भी द्वितीय राजभाषा की मानयता देकर अधिसूचित किया जा चुकी है; लागु कब होगी ?
7 – पंचायत उपबंध ( अनुसूचित क्षेत्र पर विस्तार) अधिनियम 1996 के तहत अर्थात पेसा एक्ट ” ग्राम सभा ” का अधिकार ” हमारे गाँवों में हमारा राज ” कब लागु होगी ?
8 – संविधान के अनुच्छेद- 244(1) के मातहत 5 वीं अनुसूची के अन्तर्गत
” अनुसूचित जन जाति सलाहकार परिषद ” की गठन अनिवार्य है। परन्तु अभी टीएसी का गठन क्यों हुई ?
9 – झारखंड राज्य में पारा शिक्षकों की संख्या करी 80 हजार है; उनकी नियमित रूप से कब नियुक्ति होगी ?
10 – आँगनबाड़ी सेविकाओं और सहायकों को समान काम समान वेतन कब निर्धारित किया जायेगा ?








