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संताल हुल अपने गरिमा की व्यवहारिकता को लालायित


लेखक:डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर,
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग
एस पी कॉलेज, दुमका, झारखंड।

झारखण्ड देखो डेस्क :30 जून को संताल परगना के इतिहास में ‘हुल दिवस’ को एक उत्साह व उत्सव के रूप में पूरे संताल समुदाय के द्वारा मनाया जाता है। प्रति वर्ष मनाया जाने वाला यह दिवस अतीत के उन अनुभवों को जीवंत करता है और स्मरण भी कराता है कि क्यो यह लड़ाइयां लड़ी गई और किसके सुरक्षार्थ हेतु अंग्रेजों सहित अन्य समाज विरोधी व शोषकों के विरुद्ध विद्रोही होना पड़ा। इन बातों के अनुभवों में संताल समाज के भावनाओं को देखे तो इस बात से इन्कार नही किया जा सकता है कि संतालों के अरमानों का कत्लेआम किया किया। सपनों को खाक में मिलाने का प्रयास किया गया। संतालों के जज्बातों पर जुल्मोसितम का तोप चलाया गया। उनके सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया। बिल्कुल असुरक्षा की स्थिति। कुलमिलाकर विषम व विपरीत हालात। चिंता, तनाव, व अवसाद के मनोदशा में गुजरते संतालों के लिए उनके अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह बनता जा रहा था। फिर भी संताल विद्रोहियों ने विद्रोह के पूर्व सहनशीलता, धैर्य, क्षमा, त्याग, दया , ईमानदारी , तटस्थता आदि का परिचय दिया। प्रकृति प्रेमी संताल अपने सांस्कृतिक विशेषताओं के मध्य दुश्मनों को अपने दुराचारी मनोवृतियों व छलकपटती व्यवहारों को बदलने व सुधरकर चलने का मौका दिया। संतालों का यह सोच व प्रयास महाभारत के श्रीकृष्ण के शांति संदेश की तरह था। मगर अंग्रेजों के माथे विध्वंसात्मक मूल प्रवृतियां सवार थी। इधर संतालों की रचनात्मक प्रवृतियां मानवता की रक्षा को लेकर चिंतित व परेशान थी। एक सम्मान की राह तलाश में था जिससे संतालों की सांस्कृतिक विरासतों की ना केवल रक्षा हो, लोगो को जीवन सुरक्षित रहे व सामाजिक रूप से विकास के पथपर अग्रसर होता रहे बल्कि समतुल्य प्रशासन चलाकर खुद को आत्म निर्भर भी बनाना चाहते थे। मगर नियति का दोष कहे कि अंग्रेजों व अन्य क्षेत्रीय दुश्मनों (साहूकार, महाजन, जमींदार, आदि) को संतालों की इन ख्यालों को नजर लग गई। जो इनके अनुभूतियों को व्यवहार में परिलक्षित होने से पहले ही सांप के उठते फन की तरह कुचल देनी की षडयंत्र रचा जिसकी सफलता उसे सिदो मुर्मू, कान्हु मुर्मू के शहीद होने के बाद मिली।
यह ‘हुल’ या विद्रोह जिसे अंग्रेज डलहौज़ी ने क्षेत्रीय विद्रोह कह इसे प्रथम राष्ट्रीय क्रांति के रूप में स्थापित नही होने दिया वर्ना इस युद्ध मे जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नही शेष रहा था जहां अंग्रेजी हुकुकुत के विरुद्ध डुगडुगी ना बजाई गई हो। उसका प्रतिकार ना किया गया हो। जल, जंगल व जमीन के संरक्षण के लड़ाई ना लड़ी गई हो। सामाजिक रूप से उभरते संताल सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास चाहते थे जिससे उनका जीवन स्तर ना केवल गुणात्मक दृष्टि से बेहतर बने बल्कि आत्म सम्मान व स्वाभिमान के साथ जिंदगी जी सके। वो स्वयं के समाज को आज की तरह स्वालंबी बनाना चाहते थे जिनके सपने को बिखेर दिया गया। जो तबकि विद्रोह के बाद से लेकर स्वंत्रता की आजादी 15 अगस्त 1947 व अलग झारखंड राज्य 15 नवंबर 2000 को प्राप्त करने के बावजूद संताल हुल की अनुभूतियां अपने व्यवहारिक यथार्थता को लेकर अब भी वंचित दिख रही हैं। कहने को तो 6 जिला (देवघर, गोड्डा, जामताड़ा, दुमका, पाकुड़, व साहिबगंज) मिलकर संताल परगना कहलाता है मगर अपेक्षित विकास को अब भी उपेक्षित है।
हुल हो या क्रांति के अचेतन में विकास व सामाजिक परिवर्तन की भावना छिपी होती है। संताल हुल इस बात का भी समर्थन करता है। मगर बिडंबना इस बात की रह जा रही है कि वीर सिद्धो, कान्हु, चांद, भैरव, फुलो, झानो आदि संताल सूरमाओं ने जिस सामाजिक कल्याण व नैतिक उत्थान की भावना से , जिस उद्देश्य से व जिस आत्मविश्वास अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह को मनोबल ऊंचा किया और अपने को समर्पित किया वो अब भी वर्त्तमान पीढ़ी से अनेकों सवाल करती है। सवाल करती है कि संतालों की धरती संताल परगना का विकास किस हद हुआ है? खनिज संपदा से पूर्ण राज्य देश मे बेहतर राज्य साबित हुआ की नही? शिक्षा ,स्वास्थ्य व अर्थ व्यवस्था के क्षेत्र में चहुमुखी विकास का स्तर क्या है? राजनेताओं ने ईमानदारी के साथ इस क्षेत्र की विकास के लिए कितने योजनाओं को सफल जमीन पर उतारा भी है या ये केवल फाइलों में सुशोभित है?
ये वो चित्कारी संवेदनाएं है जिसकी दर्द अब भी संतालों को सालती है। संभवतः उनके सपनो को संताल परगना बने जरूरत है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हुल करने की। जिसकी आभा से ना केवल समाज, राज्य व देश रौशन होगा बल्कि देश के प्रधानमंत्री का स्वालंबन का नारा भी बुलंद होगा।

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