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संताल विद्रोह 1855-1856  “अधिकारविहिन हाशिए पर के लोगों की आजादी की पहली संगठित सशस्त्र क्रांति “


लेखक :डॉ दिनेश नारायण वर्मा,इतिहासकार

झारखण्ड देखो डेस्क :औपनिवेशिक भारत (1757-1947) में विदेशी शासक और उनकी सत्ता के खिलाफ 19वीं शताब्दी का संताल विद्रोह 1855-1856 जनजातियों,दलितों और पिछड़ों की आजादी की पहली संगठित सशस्त्र क्रांति थी। संताल विद्रोह की 165वीं वर्षगांठ के मौके पर इतिहासकार डा. दिनेश नारायण वर्मा ने अधिकारविहिन हाशिए पर के लोगों की आजादी की पहली संगठित सशस्त्र क्रांति संताल विद्रोह की चर्चा करते हुए कहा कि भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी जनजातियों, दलितों और पिछड़ों के संगठित होकर अपनी आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष की यह पहली बड़ी घटना थी जिससे भारत ही नहीं पूरा
विश्व आश्चर्यचकित हो गया। उनके अनुसार इस सशस्त्र संघर्ष का ताना बाना इतना मजबूत और गोपनीय था कि विश्व की सबसे बड़ी औपनिवेशिक सरकार के अधिकारयों को इसकी भनक तक नहीं लगी और ऐसे लोगों द्वारा सशस्त्र संघर्ष का शंखनाद किये जाने पर वे हतप्रभ हो गये। प्रो. वर्मा ने कहा कि अविभाजित बंगाल के तत्कालीन लेफ्टिनेण्ट गवर्नर हालिडे  ने जब इसकी सूचना गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी (1848- 1856) को दी तो उन्हें सहसा
विश्वास नहीं हुआ और बाद में अपने एक वक्तव्य में उन्होंने इसे स्थानीय बलवा बताकर इसकी ऐतिहासिक महता को नजरन्दाज करने की कोशिश की। इतिहासकार वर्मा ने कहा कि तत्कालीन विश्व की सबसे बड़ी  औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ अधिकारविहिन हाशिए पर के लोगों की चट्टानी एकता और जबर्दस्त खूनी संघर्ष बेजोड़ और बेमिशाल था। उन्होंने कहा कि यह पहला अवसर था जब अविभाजित बंगाल के एक बड़े भू-भाग में संतालों की अगुवाई में संताल परगना के धरती पुत्रों ने एकजुट होकर विदेशी शासन के खिलाफ अपना दम खम दिखाया और हथियार नहीं डाले। प्रो.वर्मा के अनुसार ऐतिहासिक दृष्टिकोण से संताल विद्रोह देश का पहला सशस्त्र जंग था जिसमें अधिकारविहिन हाशिए पर के लोगों की मुख्य और अहम भूमिका थी।

            इतिहासकार वर्मा ने कहा कि
विश्व में पहली बार अधिकारविहिन हाशिए पर लोगों ने अपनी आजादी के लिए परचम लहराया जिससे उनमें राजनीतिक चेतना नहीं होने की साम्राज्यवादी अवधारणा धाराशायी हो गई। साम्राज्यवादियों द्वारा उन्हें असभ्य,बर्बर और जंगली होने की हवा निकल गई। प्रो. वर्मा के अनुसार कथित लोगों को किसी प्रकार का कोई राजनीतिक प्रशिक्षण नहीं दिया गया  था। इसके नायक किसी राजा या जमींदार के वंशज नहीं थे इसके बावजूद उन्होंने बेजोड़ राजनीतिक सूझबूझ और दूरदर्शिता दिखाई और विदेशी शासन को उखाड़ फेकने के लिए अपना पूरा दम खम लगाया। यह जनजातियों के इतिहास का गौरवशाली पहलू है और देश के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। प्रो.वर्मा के अनुसार यह ठीक है कि सत्ता,शक्ति,शस्त्र और सेना के बल पर विदेशी शासन ने उनका क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया तो यह भी सत्य है कि किसी भी साम्राज्यवादी लेखक ने भी उनके द्वारा हथियार डालने या रण छोड़ कर पलायन करने का कहीं उल्लेख नहीं किया है।मेजर जर्विस,कैप्टेन शेरविल आदि कम्पनी के सैन्य अधिकारियों के अनुसार वे अन्तिम दम तक लड़ते रहे और आत्मसमर्पण नहीं किया। इतिहासकार वर्मा के अनुसार

19वीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में अधिकारविहिन हाशिए पर लोगों की अपनी आजादी और शोषण व उत्पीड़न के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का यह चर्मोत्कर्ष था।  ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज सिविल और मिलिटरी अधिकारियों को ऐसे लोगों के जुझारूपन और जबरदस्त रूप से संगठित होकर अपनी आजादी के लिए संघर्ष करने हेतु एकजुटता की कोई जानकारी नही थी। दामिन-इ-कोह के अधीक्षक जेम्स पोन्टेट द्वारा  इस ऐतिहासिक घटना के पूर्व प्रेषित सरकारी रिपोर्ट में किसी तरह के क्षेत्रीय गड़बड़ी होने की आशंका का उल्लेख नहीं है।  इतिहासकार वर्मा ने कहा कि कम्पनी के सिविल और मिलिटरी अधिकारी साम्राज्यवादी लेखकों की उस अवधारणा से ही अवगत थे जिसमें जनजातियों को जंगली,असभ्य, बर्बर  और राजनीतिक चेतना विहिन बताया था पर वे उनकी एकता,जुझारूपन,संगठित शक्ति और विदशियों को देश से भगाने व अपना राज स्थापित करने की अद्भूत कोशिश  से पहली बार रूबरू हुए और हतप्रभ रह गये।

        प्रो. वर्मा के अनुसार संताल परगना में अधिकारविहिन हाशिए पर के लोगों ने अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता और सूझ बूझ का अविश्सनीय नमूना पेश किया और वि·ा की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकत के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ी। पहली बार वैश्विक
स्तर पर उनके स्वातंत्र्य प्रेमी होने का लोगों को आभास हुआ और अपना राज स्थापित करने के लिए उनके द्वारा अपनायी गयी बेजोड़ रणनीति की जानकारी हुई। इतिहासकार वर्मा के अनुसार विद्रोह के पूर्व सिदो और कान्हू ने अपनी रणनीति के तहत अपने क्षेत्र के ग्वाले, तेलियों,लोहारों,रजवाड़ों,कहारों,चमारों और डोमों आदि हिन्दू समुदाय के पिछड़े,गरीब और दलित वर्गों से सम्पर्क स्थापित किया। जमींदार,महाजन और साहिबों की मिलीभगत से शोषित और प्रताड़ित पहाड़िया,भुइयां,घांगड़,कोल आदि जनजातीय समुदाय के लोगों ने भी बड़े पैमाने पर संतालों की मदद की। प्रो.वर्मा के अनुसार यह उनकी दूरदर्शिता का ही प्रतिफल था कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के मोमिनों(जुलाहों ) से सम्पर्क किया और उनका सहयोग और समर्थन प्राप्त कर लिया। उनके अनुसार मछली पकड़ने और नाव चलाने का व्यवसाय करने वाले माल,पालकी ढोने और अन्य प्रकार के शारीरिक कार्य करने वाले भोवजा,श्रमिक और सामान ढोने का कार्य करने वाले धानुकों आदि से भी संतालों ने सम्पर्क स्थापित किया और ये सारे लोग भी विदेशी शासन कि खिलाफ जंग में उनके साथ शामिल हो गये। इससे उनकी सम्मिलित ताकत बढ़ गी क्योंकि ऐसे सभी लोग आपसी भाईचारे की भावना से प्रेरित हुए  जिसने धर्म और जाति के बन्धनों को तोड़ दिया। इतिहासकार वर्मा के अनुसार देश में साम्प्रदायिक एकता की यह पहली मिशाल थी जिसने पहली बार भारतीयों को साम्प्रदायिक एकता की ताकत से अवगत कराया। इस प्रकार उन्होंने सभी लोगों के साथ मिलकर गोपनीय तरीके से ऐसी रणनीति बनाई कि साम्राज्यवादी ताकतों को इसकी सतही जानकारी भी नहीं हुई। इतिहासकार वर्मा के अनुसार साम्राज्यवादियों ने जिन्हें असभ्य,जंगली और बर्बर कहा था, राजनीतिक चेतना विहिन कहा था,उन्हीं अधिकारविहिन हाशिए पर के लोगों ने अपनी मातृभूमि को  विदेशियों से मुक्त करने के लिए जबरदस्त संघर्ष किया जिसके फलस्वरूप अविभाजित बंगाल और आज के तीन प्रान्तों पश्चिम बंगाल,झारखंड और बिहार के एक बड़े इलाके में  ईस्ट इंडिया कम्पनी शासन की नींव हिल गयी। डब्ल्यू.डब्ल्यू.हंटर (1868) और सी.ए. बकलैंड (1901) सरीखे साम्राज्यवादी लेखकों नें भी संताल विद्रोह के नायक सिदो और कान्हू के व्यक्तित्व की प्रशंसा की और उन्हें देशवासियों का उद्धारक बताया।

   

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