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संताल परगना का गठन ऐतिहासिक सशस्त्र संघर्ष का प्रत्यक्ष परिणाम-डॉ दिनेश नारायण वर्मा,इतिहासकार

डॉ दिनेश नारायण वर्मा ,इतिहासकार

संताल परगना गठन की 165वी वर्षगांठ पर विशेष

झारखण्ड देखो डेस्क :22 दिसम्बर 1855 को संताल परगना जिले का गठन एशिया महादेश का सबसे बड़ा जन आन्दोलन और भारत की सबसे बड़ी जन क्रांति संताल हूल 1855-1856 का प्रत्यक्ष परिणाम था। संताल परगना जिले(अब प्रमंडल) के गठन के 165 वर्ष पूरे होने के अवसर पर कथित जानकारी देते हुए इतिहासकार डॉ दिनेश नारायण वर्मा ने कहा कि जिले के गठन के बाद की इससे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएं भी कम क्रांतिकारी नहीं है। उन्होनें बताया कि साम्राज्यवादी सरकारी लेखक एच.मैकफर्सन की रिपोर्ट (1909) से स्पष्ट है कि संताल विद्रोह के दमन के बावजूद संताल परगना में विदेशी शासन का प्रतिवाद जारी रहा और शीघ्र ही अत्यधिक रेन्ट के मामले (1860-1861) को लेकर संताल परगना एक बार फिर से अशांत हो गया। पर संताल विद्रोह से मिले सबक के आलोक में ब्रिाटिश अधिकारियों ने तत्काल कार्रवाई की और संतालों की समस्यायों को दूर करने का प्रयास किया। इतिहासकार वर्मा के अनुसार इसके बावजूद अपना राज स्थापित करने के लिए संतालों का संघर्ष समाप्त नहीं हो गया बल्कि उनके संघर्ष का स्वरूप बदल गया जो साफहोड़ आन्दोलन (1869-1874) के रूप में प्रस्फुटित हुआ। उन्होंने बताया कि साफहोड़ आन्दोलन का बार बार दमन किये जाने के बावजूद अंग्रेज अधिकारी इसका दमन नहीं कर सके और बाद में यह आन्दोलन स्वतंत्रता आन्दोलन से एकीकृत हो गया। इतिहासकार वर्मा के अनुसार बिहार राज्य अभिलेखागार में सुरक्षित दस्तावेजों के अनुसार स्वतंत्रता आन्दोलन में साफाहोड़ संतालों ने अहम योगदान किया। इस प्रकार अपना राज स्थापित करने के लिए संतालों का संघर्ष संताल परगना के क्षेत्रीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है जिसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की शुरुआत संताल विद्रोह से हुई।

इतिहासकार वर्मा के अनुसार संताल विद्रोह के दमन बावजूद कम्पनी सरकार इसकी व्यापकता,तीव्रता,जनसां- ख्यकीय संगठन और दूरगामी प्रभाव वाले संदेशों आदि से गम्भीर रूप से प्रभावित हुई और भागलपुर के कमिश्नर ए.सी.बिडवेल ने सरकार को प्रेषित अपनी रिपोर्ट में संतालों की जायज शिकायतों की विस्तृत विवेचना की। यह स्वीकार किया गया कि जिस शासन व्यवस्था के अन्तर्गत संतालों पर शासन किया जाता था वहीं विद्रोह के लिए उत्तरदायी थी। इसलिए यह निश्चित किया गया कि बंगाल प्रेसिडेन्सी में लागू सरकार के एक्ट और रेगुलेशन्स संतालों पर लागू नहीं होने चाहिये। इसके फलस्वरूप दामिन-इ-कोह और इसके आस पास के इलाके जहां संताल निवासित थे वीरभूम और भागलपुर से अलग कर दिये गये और 22 दिसम्बर 1855 को पारित अधिनियम 37 के प्रावधानों के तहत नन-रेगुलेशन जिला संताल परगना का गठन किया गया। उन्होंने कहा कि अमेंडिंग एक्ट 1903 के द्वारा इस अधिनियम का नाम बदलकर संताल परगना अधिनियम किया गया। पर जिला गठन के बाद इसके नन रेगुलेशन प्रावधानों के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न हो गया। इतिहासकार वर्मा के अनुसार लेफ्टिनेण्ट गवर्नर ने एडवोकेट जनरल द्वारा इसके नन-रेगुलेशन प्रावधान को रद्द करने के विचार को स्वीकार कर लिया और साधारण कानूनों को लागू करने का निर्देश भी जारी कर दिया जब तक कि विशेष रूप से संताल परगना उन कानूनों के लागू होने से मुक्त नहीं कर दिया जाता। इसके परिणामस्परूप रेन्ट कानून,द सिविल प्रोसेडूउर कोड,स्टाम्प एक्ट और अन्य कानून संताल परगना में लागू समझे गये। इससे अन्य जिलों की तरह संताल परगना भी रेगुलेशन जिला हो गया और लोगों को भारी कष्ट झेलने से लिए विवश होना पड़ा। रेन्ट में वृद्दि,जमींदारों के अत्याचार आदि से संताल परगना फिर से अशांत होने लगा और आन्दोलित हो गया। इससे भयभीत सरकार ने शीघ्र जांच की और संतालों की शिकायतों को जायज पाया।

इतिहासकार वर्मा ने यह जानकारी भी दी कि भारत सरकार के सचिव ने बंगाल सरकार को लिखित अपने पत्र (पत्र संख्या 1258 ए दिनांक 26 जुलाई 1871) में एडवोकेट जनरल की धारणा को गलत ठहराया और इसकी जानकारी भागलपुर के कमिश्नर को भी दी गई (पत्र संख्या 4957,9अक्टूबर 1871)। संताल परगना सेटलमेंट रेगुलेशन 3 ऑफ 1872 पारित कर संताल परगना में साधारण कानूनों को लागू करने से रोक दिया गया और इसे फिर से नन-रेगुलेशन जिला बना दिया गया जैसा कि संताल परगना को एक्ट 37 ऑफ 1855 में घोषित किया गया था। इसलिए साम्राज्यवादी सरकारी लेखक मैकफर्सन ने संताल परगना सेटलमेंट रेगुलेशन 3 ऑफ 1872 को “संताल परगना का मैगनाकार्टा” बताया था।

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