
लेखक :डॉ धनंजय कुमार मिश्र
अभिषद् सदस्य
सिदो कान्हू मुर्मू विवि ,दुमका
दुमका :सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका ही नहीं झारखण्ड राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों को उनको वेतनादि का उचित लाभ नहीं मिल रहा है । इसके पीछे सिर्फ़ एक ही मूल कारण है आपसी मतभेद व सम्यक् जानकारी की कमी। सबसे विकट समस्या 2008 में नियुक्त शिक्षकों की है। प्रशासन की उदासीनता का सीधा प्रभाव इन शिक्षकों पर पड़ रहा है । झारखंड सचिवालय यहाँ के विश्वविद्यालयों पर हावी है। जब जो जी चाहे विश्वविद्यालय द्वारा दिए गये लाभ को सचिवालय का एक पत्र निरस्त कर देता है। एक तरफ़ संवैधानिक दृष्टि से जहाँ विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है वही व्यावहारिकता में यह लागू नहीं दिखाई दे रहा है । विश्वविद्यालय को वेतनादि के लिए राज्य सरकार का मुँह देखना पड़ता है। इस स्थिति का अनुचित लाभ लेकर सचिवालय विश्वविद्यालय पर अनावश्यक दवाब बनाकर शिक्षकों को लाभ से वंचित रखता है। न तो समय पर पदोन्नति हो पाती है और न ही प्राप्य लाभ मिल पाता है ।
अभी एक दो मामलों में कुछ शिक्षक न्यायालय की शरण में गए हैं पर निर्णय आने ने पहले ही कुछ काल-कवलित हो गए तो कुछ बिना किसी सेवा निवृत्ति लाभ के ही सेवानिवृत्त । सबसे बड़ी बात है कि महाविद्यालय/ विश्वविद्यालय शिक्षकों की सेवा नियमावली अस्पष्ट है। राज्य सरकार के कर्मचारियों की तरह न तो इनका वेतन निर्धारण होता है और न भत्ते। अगर कभी सतही तौर पर कुछ अधिकारियों ने इस पर काम करना भी चाहा तो अनावश्यक रूप से उन अधिकारियों को तंग करते हुए विश्वविद्यालय के नियम परिनियम दिखाते हुए विरोध किया गया।
अभी भी 2008 में नियुक्त शिक्षक न तो ओ पी एस में हैं और न ही एन पी एस में । पेंशन का पेंच फँसा पड़ा है। पी एफ के नाम पर बचत खाते में राशि जमा की जाती है जिससे शिक्षकों को व्याज का जबरदस्त नुकसान हो रहा है। हास्यास्पद स्थिति तो यह कि वेतन एवं मंहगाई भत्ता सातवें वेतनमान के अनुसार दिया जा रहा है जबकि चिकित्सा भत्ता आदि छठे वेतनमान के अनुसार दिया जा रहा है ।
सम्पूर्ण समस्याओं का एकमात्र निदान यह है कि या तो विश्वविद्यालय को मुक्त वातावरण देते हुए सचिवालय को विश्वविद्यालय के कार्य में हस्तक्षेप करने से सरकार रोके या फिर विश्वविद्यालय नामक संस्था को समाप्त कर सरकार अपने उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्रालय के पूर्णतः अधीन करते हुए विश्वविद्यालय के कर्मचारियों व शिक्षकों का राज्य सरकार का कर्मचारी घोषित कर सम्पूर्ण रूप से अपने अधीन कर ले।
झारखण्ड के शिक्षक संघों में न तो संघर्ष करने की क्षमता रही न इच्छा । शिक्षक नेताओं का आपसी मतभेद व क्षुद्र महत्वाकांक्षा से शिक्षक समुदाय का झारखण्ड में भला नहीं ।









