Home / News / आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्तियों पर लगे मनोसामाजिक लगाम

आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्तियों पर लगे मनोसामाजिक लगाम


लेखक :डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग
एस पी कॉलेज, दुमका।

झारखण्ड देखो डेस्क :कोविड-19व लॉक डाउन के बजह से देश मे अप्रत्याशित आत्महत्या की घटनाएं घट रही है। जिसमे युवाओं की संख्या अधिक देखी जा रही है जिसमे आर्थिक तंगी, काम का नुकसान, व्यापारिक घाटे, संवेगात्मक विसंगति, पारिवारिक चिंता,आदि ऐसी कई कारणें है जो इसकी आवृति को बढ़ा रही है। इस तरह की घटनाओं ने ना केवल देश की चिंता बढ़ाई है बल्कि देश की आधी आबादी जिसमे बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी शामिल है विषादों से गुजर रहे है उन्हें संभालने की भी सख्त जरूरत है। इस बढ़ते तनाव व दबाब की चुनौतियों से निपटने की तत्काल पहल की आवश्यकता है। विपदा की ऐसी घड़ी में इन चुनौतियों से मुकाबले को मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप भी उतना ही आवश्यक प्रतीत होता है जहाँ लोगो को जरूरत के हिसाब से परामर्श व मनोचिकित्सीय प्रबंध के द्वारा बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

कुछ मनोवैज्ञानिक मंत्र कुछ इस प्रकार है जिसके व्यवहारिक चलन से काफी हदतक विषाद पर नियंत्रण पाया सकता है और आत्महत्या के ग्राफ को निम्न किया जा सकता है।
1. व्यवहारों का निरीक्षण: लोगो के वैसे सभी व्यवहारों का निरीक्षण हो जो विचलित व असामान्य किस्म के लगे। ऐसे व्यवहारों की बारंबारता होने से ना केवल सतर्क होने की जरूरत है बल्कि ध्यान चेतना में लाते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मिलने की तत्काल पहल की जरूरत है।
2. गत्यात्मकता या कारणों को समझने की जरूरत : उनके उन तमाम विचलित व्यवहारों को विश्वास भरे अंदाज़ में समझने का प्रयास हो जिससे उनके अचेतन भावो को भी समझा जा सके।
3. भावनाओं को अभिव्यक्त करने का पूर्ण मौका दे: अक्सर लोग इसी बात से दुःखित हो जाते है कि कोई उनकी बातों को सुनना नही चाहता है। जिससे उसमे कुंठा घर करता है और आंतरिक आक्रामकता बढ़ती है। जरूरत है ऐसा फैमिली या सोशल या फ्रेंड क्लब बनाकर भी ऐसा किया जा सकता है। यह टेली कॉन्फ़्रेंसिंग से भी संभव है।
4. अच्छी बातों का प्रोत्साहन दे: यह जरूरी है कि अच्छे सोच व चिंतन बढ़ाने के लिए अच्छे बातो का प्रोत्साहन दे जिससे उसमे ना केवल सकारात्मक विचार पनपेंगे बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ेगा व सही निर्णय लेनी कि क्षमता का विकास होगा जिससे आत्महत्या की घटनाएं रुकेगी।
5. सफल अभियोजन में सहयोग करे: हर तरह की परिस्थितियों में चाहे सम हो या विषम संतुलित व्यवहार अभियोजन करने को सहयोगात्मक व्यवहार की अपेक्षा होती है। इसके सतत गतिशीलता की रणनीति बने जिससे लोग कभी उपेक्षा का शिकार नही होंगे और विषाद से बचेंगे।
6. रचनात्मक व प्रशंसनीय कार्यों का अनुमोदन: यह भी देखा जाता कि लोग अपने ज्ञान व समझ से कुछ-न-कुछ समाज के बेहतरी के लिए अनूठे व नए किस्म के कार्य कर डालते है जिसका सामाजिक अनुमोदन नही मिलने से भी निराश होती है। और उसे कुछ भी अच्छा करना व्यर्थ लगता है। यहां भी सामाजिक सोच व चिंतन को प्रगाढ़ व विस्तारित करने की जरूरत है । यदि सचमुच में विषाद पर नियंत्रण व आत्महत्या की घटनाओं पर अंकुश की चाह व मजबूत इरादे है तो।
7. सतत अभिप्रेरणा व प्रोत्साहन: लोग अभिप्रेरित होकर ना केवल चुनौतियों के पार उतरते है बल्कि प्रोत्साहन के बल वो हर जोखिम कार्य को भी सफल साबित कर देते है। जहां ऐसे चिंतन को तनाव व विषाद छू तक नही पाती है।
8. रोजगार के अवसरों से जोड़ना: युवा में विषाद का मुख्य कारण यही है कि वो खास अवसरों से या तो वंचित हो जाते है या कर दिए जाते है। कारण जो भी। प्रयास हमेशा उन्हें आर्थिक रूप से सम्बल बनाने की होनी चाहिए जिसे उसके चेहरे पर खुशी का भाव रहे।
9. काबिलियत व क्षमता के अनुरूप कार्य व सम्मान मिले: युवाओं में इस बात को लेकर टेंशन रहता है कि उन्हें उसकी काबिलियत व क्षमता के हिसाब से ना तो काम दिया जाता है और ना सम्मान ना पैसा या मजदूरी। यह उपेक्षणीय व्यवहार आंतरिक विषाद को बढ़ाता है।
10. सामाजिक अंतःक्रिया कलापों को बढ़ावा मिलें: लोगों की एक दूसरे की भावनाओं को ना समझने व जानने की बजह से लोग अपने को बेकार समझने लगते है जो खासकर के बच्चों व बुजुर्गों में देखने को मिलता है को बढ़ावा मिलनी चाहिए जिससे समय रहते उनके परिवर्तित विचलित लक्षणों पर अंकुश लगाया जा सके। उसे विषादी होने से बचाया जा सके।
11. परामर्शीय हस्तक्षेप: जब अपेक्षित व्यवहार बदलाव में बात आमजन के प्रयास से जब बिगड़ने लगे तो ऐसी स्थिति में तुरंत निःसंकोच होकर परामर्शीय चिकित्सा सहयोग
को कदम उठा लेना चाहिए।
12. अहम रक्षा प्रक्रमो को धारदार बनाये जाने की जरूरत: दमन, युक्तिकरण, प्रक्षेपण, स्थानांतरण, प्रतिगमन, बौद्धिकरण, अस्वीकरण, विस्थापन आदि चेतन व अचेतन रक्षा प्रक्रमो के मजबूती से व्यक्ति वातावरण की चुनौतियों को आसानी से पार उतर जाएगा जिससे मन मे ना तो कोई हीन भावना या सामाजिक निंदा जैसी कोई बात होगी ना आत्महत्या जैसी घृणित अपराधबोध का भाव ही उत्पन्न होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *