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आदिम पहाड़िया जनजाति की ऐतिहासिक सभ्यता और संस्कृति के  शोधकर्ता इतिहासकार डॉ दिनेश नारायण वर्मा


विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष

झारखण्ड देखो डेस्क :-संताल परगना (झारखंड) की प्राचीनतम आदिम पहाड़िया जनजाति का इतिहास-लेखन नहीं है। इतिहासविदों की इस उपेक्षा से देश की एक प्राचीनतम आदिम जनजाति के इतिहास,सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं की प्रामाणिक जानकारी किसी को नहीं हुई। जनोन्मुखी इतिहास (स्टडी ऑफ हिस्ट्री फरोम बिलो) और निम्नवर्गीय प्रसंग (सबाल्टर्न स्टडीज) के लेखकों की उपेक्षा से इस जनजाति का क्रमिक और प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। हालांकि साम्राज्यवादी इतिहासकारों और ब्रिाटिश प्रशासनिक अधिकारियों ने अपने अध्ययन और रिपोर्ट में आदिम पहाड़िया जनजाति के सम्बन्ध में अवश्य लिखा और इस जनजाति के सम्बन्ध में कुछ टीका-टिपण्णी भी की। पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इस आदिम जनजाति की सभ्यता,संस्कृति और इतिहास की विवेचनात्मक समीक्षा नहीं किये जाने से पहाड़ियों का प्रामाणिक इतिहास-लेखन नहीं है। विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त के मौके पर इस जानजाति की सभ्यता,संस्कृति और इतिहास का प्रामाणिक व क्रमिक अध्ययन और लेखन करने वाले इतिहासकार डा.दिनेश नारायण वर्मा ने उपरोक्त जानकारी देते हुए बताया कि भारत के 75 आदिम जानजातियों में शामिल पहाड़िया जनजाति के लोग औपनिवेशिक काल में ही नहीं बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी वर्षों तक उपेक्षित रहे। इतिहासकार डा.वर्मा के अनुसार इसके फलस्वरूप आधुनिक सभ्यता की दौड़ में पहाड़िया काफी पीछे पड़ गये,उनका जनसांख्यकीय ह्यास ही नहीं हुआ बल्कि उनके इतिहास,सभ्यता और संस्कृति की वैज्ञानिक विवेचना करने की ओर किसी विद्वान का ध्यान भी नहीं गया। जनजातीय इतिहास के जानकार डा.वर्मा ने सर्वप्रथम पहाड़िया जनजाति की सभ्यता,संस्कृति और इतिहास के प्रामाणिक पहलुओं को संकलित  ही नहीं किया बल्कि इसे संताल परगना के क्षेत्रीय इतिहास के अध्ययन में एकीकृत करने की सफल कोशिश भी की। उन्होंने कहा कि स्वातंत्र्य प्रिय और अपनी लड़ाकू प्रवृति के कारण पहाड़ियों ने विदेशी ताकतों की जबरदस्त खिलाफत की और आजादी की लड़ाई में सक्रिय योगदान किया।            
संताल परगना के क्षेत्रीय और आदिवासी इतिहास पर शोध और शोध कार्यों का निर्देशन करने (तिलका मांझी भागलपुर वि.वि.भागलपुर,बिहार और सिदो कान्हू मुर्मू वि.वि.दुमका,झारखंड ) के क्रम में डा.वर्मा प्रो.डा.एस. एम. हबिबुद्दीन, प्रो.डा.क्षेमेन्द्र कुमार सिंह,(भागलपुर,बिहार), के प्रो.डा. एस.गोपाल, प्रो.आर.एन.बनर्जी,(पटना,बिहार), प्रो.डा.एस.डी. मंडल,प्रो.सुरेश्वर 

नाथ,प्रो.डा.एस.पी. सिंह(साहिबगंज, झारखंड) आदि इतिहासकारों के सम्पर्क में आये जिनसे उन्हें उपेक्षित पहाड़िया जनजाति की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास की खोज और इसे लिपिबद्ध करने की प्रेरणा मिली। संताल परगना की संस्कृति और इतिहास में विशेष रूचि रखने वाले दुमका के प्रख्यात लेखक डा.वासुदेव बेसरा, मशहूर पत्रकार दुमका दर्पण के संस्थापक सम्पादक डा.मधु सूदन मधु और प्रख्यात साहित्यकार डा.डोमन साहु समीर (देवघर) ने भी पहाड़िया जनजाति की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया और उन्हें पहाड़िया इतिहास- लेखन के लिए प्रोत्साहित  किया। उन्होंने कम्पनी शासन (1757- 1857) और क्राउन शासन (1858-1947) कालीन संताल परगना से सम्बन्धित अधिकांश ऐतिहासिक दस्तावेजों का गहन अध्ययन

किया और आदिम पहाड़िया जनजाति के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति की समीक्षात्मक विवेचना प्रस्तुत की। अपने शिक्षक प्रो.नाथ के साथ संयुक्त रूप से उन्होंने कई शोध आलेख लिखे जो पत्रिकाओं और पुस्तकों में प्रकाशित हुए।नई दिल्ली,पटना,जयपुर,उदयपुर,कोलकाता,रांची,दुमका,बिदिशा (नारायणगढ़, पश्चिम मेदिनीपुर,पश्चिम बंगाल) आदि स्थानों से प्रकाशित होने वाले शोध पत्रिकाओं,सम्पादित पुस्तकों और विभिन्न समाचार पत्रों में आलेखों के प्रकाशन के अलावा बिहार इतिहास परिषद् और इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस आदि शैक्षणिक संस्थाओं के वार्षिक सम्मेलनों में उन्होंने कई शोध आलेख प्रस्तुत किये और इनकी प्रोसिडिंग्स में भी उनके आलेख प्रकाशित हुए। इन प्रकाशनों के माध्यम से उन्होंने पहाड़िया जनजाति के इतिहास,सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित किया और ऐतिहासिक व प्रामाणिक दस्तावेजों में वर्णित तथ्यों के आलोक में पहाड़िया जनजाति को संताल परगना की प्राचीनतम आदिम जनजाति बताया। वर्ष 1993 में प्रकाशित अपनी कृति “पहाड़िया जनजाति का संक्षिप्त इतिहास” में उन्होंने पहाड़िया जनजाति की संताल परगना के मूल निवासी के रूप में प्रामाणिक एवं समीक्षात्मक विवेचना प्रस्तुत की। इस रचना के अवलोकन से स्पष्ट है कि पहाड़िया जनजाति का प्राचीन,मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास की संक्षिप्त विवेचना प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तवेजों पर आधृत है। प्रो सुरेश्वर नाथ (साहिबगंज) के साथ संयुक्त रूप से लिखित इतिहासकार वर्मा की यह पुस्तक स्नातकोत्तर इतिहास (एस.के.एम.यू.दुमका)के सिलेबस में अनुमोदित है। इस पुस्तक में परिशिष्ट सहित कुल पाँच अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय के व्यापक संदर्भ का उल्लेख है।पुस्तक में पहाड़िया जनजाति के संघर्षपूर्ण गौरवशाली इतिहास की विस्तृत विवेचना है। लेखक इस पुस्तक के द्वितीय संशोधित प्रकाशन के लिए प्रयासरत हैं।              

            इसके पूर्व शोधक (जयपुर,राजस्थान),वन्यजाति (नई दिल्ली) ट्राइब(उदयपुर),दस्तक(जमशेदपुर) और दैनिक और साप्ताहिक समाचार पत्रों (प्रभात खबर,हिन्दुस्तान,दैनिक जागरण,·श्वेत पत्र,भारत मित्र, दुमका दर्पण) के विभिन्न अंकों में भी इतिहासकार वर्मा के इस जनजाति की सभ्यता,संस्कृति और इतिहास विषयक आलेख प्रकाशित हुए–

शोधक,जयपुर,राजस्थान

1.रोल ऑफ पहाड़िया ट्राइब इन 1942,वाल्यूम 19,सिरियल नं.55,1990,पृ. 38-47 (प्रो.डा.एस.एम.

  हबिबुद्दीन के साथ)

2.द पहाड़ियाज चैलेन्ज टू द ब्रिाटिस कोलोनियलिज्म इन बिहार 1763-1940,वाल्यूम 22,सिरियल नं.

  65,1993,पृ.65-77(प्रो.एस.नाथ के साथ)

3.ए सर्वे ऑफ द हिस्ट्री ऑफ पहाड़िया ट्राइब,वाल्यूम 23,सिरियल 67,1994,पृ.28-41(प्रो.एस.नाथ के

  साथ)

4.स्ट्रांग अपोजिसन फरोम द अटोकटोन पाहाड़िया टू द इमिग्रेशन ऑफ संताल्स इन टू द जंगल तराई,

  वाल्यूम 25,सिरियल नं.75,1996,पृ.182-185                

5.द मलेर्स ऑफ राजमहल हिल्स डयूरिंग लास्ट फाइव डिकेड्स,वाल्यूम 29,सिरियल नं.87, 2000,

  पृ.141-150

6.इंटेरेक्शनस एंड आसपेक्ट्स ऑफ ट्राइबल लाइफ इन द संताल परगनाज डिविजन,वाल्यूम 30,

  सिरियल नं.89,2001,पृ.168-176

प्रोसिडिंग्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस

1.द प्रिमिटिव पहाड़ियाज रेरसिसटेन्स टू द ब्रिाटिश इम्पिरियलिज्म इन बिहार 1763-1941,दिल्ली,1993

  पृ.517 (एवस्ट्रैक्ट)

2.मिथ ऑफ पहाड़ियाज वेलफेयर एंड द अर्ली ब्रिाटिश ओफिलियल्स,दिल्ली,1995,पृ-733 (प्रो.एस.नाथ

  के साथ,एवस्ट्रैक्ट)

3.सम अननोन पहाड़िया फ्रिडम फाइटर्स ऑफ संताल परगनाज डिविजन इन झारखंड स्टेट,कोलकाता

  2000–2001पृ.733-738

4.डिमोग्राफिकल स्टेटस ऑफ ट्राइबल पोपुलेसन इन कनट्म्पोरारी इंडिया-ए स्टडी ऑफ ट्राइबल

  पोपुलेसन इन झारखंड विथ स्पेशल रेफेरेन्स टू सेनसस रिपोर्टस 1991,2001,2011,पृ.962–968

वन्यजाति,नई दिल्ली  

1.द अटोकटोन पहाड़ियाज थ्रू द एजेज,वाल्यूम ज्र्ख्र्क्ष्ज्,जनवरी 1996 पृ.10-15

2.द अटोकटोन पहाड़ियाज ऑफ संताल परगनाज एंड द अर्ली ब्रिाटिश ऑफिसियल्स,

  अक्टूबर 1998,पृ.5-9

3.द सौरिया पहाड़ियाज ऑफ द संताल परगनाज डिविजन,वाल्यूम ज्र्ख्र्ज्क्ष्क्ष्,अप्रेल 1999,पृ.4-23

4.रेसिप्रोसिटि इन ट्राइबल लाइफ इन द संताल परगनाज डिविजन इन झारखंड वाल्यूम ज्र्ख्र्ज्र्क्ष्,जुलाई

  2003 पृ. 17-24

5.ट्राइबल हेरिटेज ऑफ संताल परगनाज डिविजन इन झारखंड,वाल्यूम ख्र्क्ष्क्ष्क्ष्,जनवरी 2005,पृ.1-23

6.संताल परगना प्रमंडल (झारखंड) की आदिम जनजाति सौरिया मलेर(सौरिया पहाड़िया) की समस्याएं,

  वाल्यूम ज्र्ख्र्ज्क्ष्क्ष्,अक्टूबर 2005,पृ.51-58

7.पोवर्टी एलेविएशन एंड ससटेनेबल लिवलिहुड प्रोग्राम्स फोर प्रिमिटिव ट्राइब्स इन इंडिया-ए केस स्टडी

  ऑफ द पहाड़ियाज ऑफ संताल परगनाज इन झारखंड,वाल्यूम ख्र्ज्क्ष्क्ष्,जुलाई 2009,पृ.19–27

8.संताल परगना (झारखंड) की आदिम पहाड़िया जनजाति,जनवरी 2009

8.ह्रूमन राइट्स एंड द ट्राइबल्स,ह्रूमन राइट्स एंड द वलनेरेबल प्रिमिटिव पहाड़िया ट्राइब ऑफ संताल

  परगनाज इन झारखंड-ए स्टडी ऑफ वायोलेशन ऑफ ह्रूमन राइट्स ऑफ वलनेरेबल प्रिमिटिव पहाड़िया

  ट्राइब,वाल्यूम ख्र्ज्क्ष्क्ष्क्ष्,अक्टूबर 2010,पृ.13–18

9.डिमोग्राफी ऑफ द सौरिया पहाड़ियाज ऑफ द राजमहल हिल्स,वाल्यूम ख्र्ज्र्ज्,अप्रेल 2017,पृ.31–36

10.डिमोग्राफी ऑफ द सौरिया पहाड़ियाज इन कनटेम्पोरारी इंडिया,वाल्यूम ख्र्ज्र्ज्क्ष्क्ष्,अप्रेल 2019,

   पृ.4–11

अन्य

1.पहाड़िया जनजाति:सांस्कृतिक परिदृश्य,दस्तक-13-15,जनवरी-मार्च 2004,जमशेदपुर,पृ.205-210

2.आदिम पहाड़िया जनजाति की जनसंख्या का अध्ययन,ट्राइब,जनवरी-दिसम्बर 1995,उदयपुर,

   राजस्थान,पृ.36-49

3.रिविजिटिंग द इनडिजेनस नोलेज सिस्टम ऑफ फारमिंग -ए स्टडी ऑफ झूम कल्टिवेशन द

  ओटोकटोन पहाड़ियाज ऑफ झारखंड इन हिस्टोरिकल परस्पेक्टिवस एंड इट्स इफेक्टस आन द ट्राइब,

  मैन एंड लाइफ,वाल्यूम 42 नं.1-2,जनवरी-जून 2016,आई.एस.आर.ए.ए.,बिदिशा,फुलगेरिया,पश्चिम

  मेदिनीपुर,पश्चिम बंगाल,पृ.65-72

4.डिमोग्राफी ऑफ द सौरिया पहाड़ियाज ऑफ द राजमहल हिल्स,ए क्रिटिकल स्ट्डी ऑफ कन्टिनियूटी

   ऑफ कोलोनियल लिगेसी,वाल्यूम 43 नं.1-2,जनवरी-जून,2017,पृ.133-140,पूर्वोक्त

5.संताल परगना का इतिहास,पुरातत्व और संस्कृति,प्रथम भाग,दुमका,2008,अध्याय-1,2,3,12,13,24

6.ट्राइबल चैलेनजेज टू ईस्ट इंडिया कम्पनीज रूल इन 19 सेंचुरी-ए स्टडी ऑफ ट्राइबल रिवोल्ट्स इन

  संताल परगनाज ऑफ झारखंड,इन संपा.डा. राम पाण्डे,मेकिंग ऑफ मॉर्डन इंडिया,शोधक,जयपुर ,

  राजस्थान,पृ.104-113 ( शोभा,बरहरवा के साथ)

 

7.ओरिजिन एंड ट्रेडिशन्स ठफ पहाड़ियाज-ए स्टडी ऑफ अटोकटोनस ऑफ संताल परगनाज इन

   झारखंड,इन संपा.डा.राम पाण्डे,फोक ट्रेडिशन-कलचर,हेरिटेज एंड हिस्ट्री,जयपुर,राजस्थान,2019 ,

   पृ.151-154 ( शोभा,बरहरवा के साथ)

8.पहाड़ियाज-द ओटोकटोन ऑफ संताल परगनाज इन बिहार,इन संपा.चतुरभुज साहू,ट्राइबल कलचर

  एंड आइडेनटिटी,सरूप एंड सन्स,नई दिल्ली,1998,पृ.263-270

9.द पहाड़ियाज ऑफ संताल परगनाज इन बिहार,इन संपा.चतुर्भुज साहू,ट्राइबल कलचर एंड

   आइडेनटिटी,सरूप एंड सन्स,नई दिल्ली,1998,पृ.271-279 10.मिथ ठफ पहाड़ियाज वेलफेयर एंड

   पैसिफिकेशन वाई द अर्ली ब्रिाटिश ऑफिसियल्स,इन संपा.चतुर्भुज साहू,ट्राइबल कलचर एंड

   आइडेनटिटी,सरूप एंड सन्स,नई दिल्ली,1998,पृ.280-288 (प्रो.एस.नाथ के साथ)

10.पहाड़ियाज-द ओटोकटोन ऑफ संताल परगनाज इन बिहार-ए ब्रिाफ स्टडी इन हिस्टोरिकल

   परस्पेकटिव,इन संपा.सुकुमार भट्टाचार्या,माउनटेन्स एंड फोरेस्टस इन इंडियन हिस्ट्री,इंस्टिचियूट ऑफ

   हिस्टरिकल स्टडिज,कोलकाता,2004,पृ.160-167

11.स्वतंक्षता आन्दोलन में बिहार की आदिम जनजाति पहाड़ियों की भूमिका,कार्यविवरणिका,बिहार

   इतिहास परिषद्,चतुर्थ अधिवेशन,राजगीर,1992,कैलाश पब्लिकेशन्स,मुजफ्फरपुर,2005,पृ.265-273

   (प्रो.हबिबुद्दीन के साथ)

12.द प्रिमिटिव पहाड़िया क्मयूनिटी ऑफ संताल परगनाज आन वर्ज ऑफ एक्सटिंक्सन,कार्यविवरणिका,

   बिहार इतिहास परिषद्,पंचम अधिवेशन,राजगीर,1994,कैलाश पब्लिकेशन्स,मुजफ्फरपुर ,2005, पृ.

   400-405

13.भागलपुर (बिहार) के समाहर्ता आगस्टस क्लीवलैंड 1779-1784,कार्यविवरणिका,बिहार इतिहास

   परिषद्,षष्ठ अधिवेशन,राजगीर,2005,कैलाश पब्लिकेशन्स,मुजफ्फरपुर,2005,पृ.480–489

14.क्विट इंडिया मुवमेंट एंड द प्रिमिटिव पहाड़िया ट्राइब ऑफ बिहार,द क्वाटर्ली रिव्यू ऑफ हिस्टोरिकल

   स्टडिज,वाल्यूम ज्र्ज्र्ज्र्ज्,नं..1 और 2,अक्टूबर 1995-मार्च 1996,इंस्टिचियूट ऑफ हिस्टरिकल

   स्टडिज,कोलकाता,पृ.61-68 (प्रो.एस.नाथ के साथ) .

15.चेंजिंग सिनैरियो ऑफ ट्राइबल लाइफ इन द संताल परगनाज डिविजन इन बिहार,इन संपा.चतुर्भुज

   साहू,इंडियन ट्राइबल लाइफ,सरूप एंड सन्स,नई दिल्ली,2001,पृ.261-273

16.द सौरिया पहाड़ियाज ऑफ द संताल परगनाज डिविजन इन बिहार,इन संपा.चतुर्भुज साहू,इंडियन

   ट्राइबल लाइफ,सरूप एंड सन्स,नई दिल्ली,2001,पृ.274-303

17.भूले -बिसरे पहाड़िया स्वतंत्रता सेनानी,इन. संपा. रणेन्द्र,सुधीर पाल,झारखंड एन्साइक्लोपीडिया,खंड-

   1,वाणी प्रकाशन,नी दिल्ली,2009,पृ.158-165

18.वलनेरेविलिटी ऑफ अटोकटोन पहाड़ियाज ऑफ संताल परगनाज-रिविलिंग कन्टिनियूटी ऑफ

   कोलोनियल लिगेसी,इन संपा.मागुनी चरण बेहेरा,ट्राइबल स्टडिज इन इंडिया-परस्पेक्टिव ऑफ हिस्ट्री,

   आर्केलोजी,एंड कलचर,Ïस्प्रजर 2020,पृ.113-126

शोध कार्य निर्देशन,सिदो कान्हू मुर्मू वि.वि.,दुमका

1.रवीन्द्र नाथ तिवारी,द अटोकटोन पहाड़ियाज आन द क्रॉस-रोडस,2001,पंजी.संख्या पीएच.डी.137-

  च्च्(13) 45/96

2.आदिम जनजातियों का सामाजिक और आर्थिक विकास-साहिबगंज जिले की पहाड़िया जनजाति विषयक

  अध्ययन,2013,पंजी.संख्या पीएच.डी. 595/2008

             इन आलेखों में  इतिहासकार वर्मा ने भारत की प्राचीनतम जनजाति और संताल परगना (झारखंड) के मूल निवासी पहाड़ियों के सम्बन्ध में साम्राज्यवादी लेखकों के नजरिये का खंडन किया और स्पष्ट किया कि राजमहल हिल्स में पहाड़ियों की जागीरे थीं जहां उनकी अपनी राजनीतिक व्यवस्था

कायम थी। प्राचीन काल से लेकर औपनिवेशिक युग तक उन्होंने अपनी जागीरों में बाहरी ताकतों के प्रवेश का हमेशा प्रतिवाद किया और अपनी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखी। ये छोटानागपुर के उरांव और कटिहार- पूर्णिया के घांगड़ के सजातीय और द्रविड़ प्रजाति के हैं जो संताल परगना प्रमंडल में उत्तर से दक्षिण तक विस्तृत राजमहल हिल्स और इसकी तराइयों के मूल निवासी हैं।मध्यकाल में उन्होंने राजपुतों,मुस्लिमों, मुगलों आदि से लगातार संघर्ष किया और ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रारम्भिक अधिकारियों (1765-1785) का सशस्त्र विरोध किया। इतिहासकार वर्मा के अनुसार  पहाड़िया जनजाति देश की पहली जनजाति थी जो कम्पनी शासन के सम्पर्क में आयी और विदेशी शासन का सशस्त्र प्रतिवाद किया। उनके अनुसार पहाडिया सरदारों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की सत्ता और शासन को कभी स्वीकार नहीं किया। ।

   इतिहासकार वर्मा ने साम्राज्यवादी लेखक एफ.बी.ब्रोडले-बर्ट (1905:78) द्वारा भागलपुर के कलक्टर आगस्टस क्लीवलैंड (1779-1784) को पहाड़ियों का “नेशनल हिरो” बताये जाने का जोरदार खंडन किया और ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में यह प्रामाणित किया कि अपनी नीति द्वारा क्लीवलैंड ने पहाड़ियों की ऐतिहासिक एकता को खंडित कर दिया और उनमें आपसी कलह और फूट पैदा करने की कोशिश की। साम्राज्यवादी लेखकों के अनुसार पहाडियों ने जंगल महल (1772-1780) में संतालो के देशान्तर गमन का विरोध नहीं नहीं किया पर इतिहासकार वर्मा ने साम्राज्यवादी लेखकों के इस दृष्टिकोण का भी खंडन किया और और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर पहाडियों के जबरदस्त प्रतिवाद को उजागर किया। पर संतालों के आगमन का कम्पनी शासन द्वारा प्रोत्साहन दिये जाने से पहाड़िया जनजाति के लोग पहाड़ों पर सीमित हो गये,अपनी जमीन,प्राकृतिक संसाधनों,कृषि भूमि और जंगलो पर उनका अधिकार नहीं रहा जिससे उनका तेजी से सामाजिक आर्थिक पतन हो गया । उनकी जनसंख्या में क्रमिक ह्यास होता गया। इन ऐतिहासिक तथ्यों पर साम्राज्यवादी लेखकों ने विपरीत टिपण्णी की लेकिन इतिहासकार वर्मा ने ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर साम्राज्यवादी नजरिये का पुन: खंडन किया और जनगणना के आंकड़ों के आलोक में इस जनजाति की जनसंख्या में क्रमिक ह्यास को स्पष्ट किया।

            इतिहासकार वर्मा ने कहा कि विदेशी शासन के खिलाफ संताल विद्रोह 1855- 1856 में पहाड़ियों ने अन्य जनजातियों,दलितों और पिछड़ों के साथ सक्रिय योगदान किया और संतालों का समर्थन किया। संताल परगना का इतिहास (2008:232-235) नामक अपनी रचना में उन्होंने संताल विद्रोह में प्रमाणिक दस्तावेजों के आधार पर पहाड़ियों के योगदान की विस्तृत विवेचना की । इतिहासकार वर्मा ने पहाड़ियों को असभ्य,बर्बर और जंगली बताने वाले साम्राज्यवादी इतिहासकारों के दृष्टिकोण की भी आलोचना की और अभिलेखीय दस्तावेजों के आधार पर बताया कि स्वतंत्रता के विभिन्न चरणों में उनकी भूमिका किसी से कम महत्वपूर्ण नहीं थी,विशेषकर भारत छोड़ो आन्दोलन (1942-1943) में प्रफुल्ल चन्द्र पट्टनायक (उड़ीसा),के.गोपालन (केरल) और श्रीकृष्ण प्रसाद साह (देवघर) की अगुवाई में पहाड़ियों ने बड़ा योगदान किया। इसके बावजूद,उन्होंने सूचित किया कि नेशनल बायोग्राफिज के किसी भी लेखक ने पहाड़िया स्वतंत्रता सेनानी का विवरण नहीं लिखा। पर इतिहासकार वर्मा ने गुमनाम पहाड़िया स्वतंत्रता सेनानियों की खोज की,उनकी राजनीतिक भूमिका की समीक्षा की और इससे सम्बन्धित उनका शोध आलेख  इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के प्रोसिडिंग्स (कोलकाता 2000-2001, 733- 738) में भी प्रकाशित हुआ। उनके अनुसार मांझी, नायब,सरदार आदि पहाड़ियों की सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएं हैं। संतालों की तरह इनमें कोई गोत्र विभाजन नहीं होता पर विवाह संबंधों में वे प्रशाखा विभाजनों का ख्याल रखते है । उन्होंने इस जनजाति के सामाजिक और आर्थिक विकास (1954- 2005) विषयक शोध कार्यों का निर्देशन किया और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षात्मक विवेचना प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया कि शिक्षा,साक्षरता,निवास,नियोजन,नियुक्ति,व्यवसाय,उद्योग-धन्धों आदि के उचित लाभ से बंचित इस जानजाति के लोग पेय जल,सड़क,बिजली,निवास, चिकित्सा व स्वास्थ्य आदि की सुविधा के अभाव से गम्भीर रूप से पीड़ित और प्रताड़ित हुए हैं। वर्ष 2006 में,समाज शास्त्र विभाग, महात्मा गांधी काशी

 

विद्यापीठ,वाराणसी द्वारा इंटरनेशनल इन्टरफेथ कांग्रेस आन रिलिजन एंड माडर्न सिविलेइजेशन विषयक आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार(4-6 नवम्बर,2006) में डा.वर्मा ने “संताल परगना (झारखंड)की आदिम पहाडिया जनजाति:शोषण और गरीबी की अवि·ासनीय मिशाल ” शीर्षक आलेख प्रस्तुत कर केन्द्रीय ओर प्रान्तीय सरकार  को इस जनजाति की दयनीय स्थिति से अवगत कराने का प्रयास किया और बताया कि केन्द्रीय और प्रन्तीय सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं से इस जनजाति के लोग लाभान्वित नहीं हुए। अभी तक इस जनजाति का कोई भी व्यक्ति एम.एल.ए.या एम.पी.नियुक्त नहीं हो सका और राज्य सभा में भी मनोनीत नहीं किया गया। विद्यालयों,महाविद्यालयों,सरकारी दफ्तरों और गैर सरकारी संस्थाओं में में भी इस जनजाति का नियोजन काफी कम है। इसलिए इस जनजाति के सामाजिक एक्टिविस्ट काली चरण देहरी सहित कई पहाड़िया लोगों ने संताल परगना में पहाड़िया जनजाति की ऐतिहासिक व्यवस्था को स्थापित करने,संताल परगना को पहाड़िया लैंड घोषित करने और पहाड़ियों के लिए एम.एल.ए.और एम.पी की सीटें आरक्षित करने आदि की मांग की और इस आशय का आवेदन केन्द्रीय और प्रदेश सरकार के विभिन्न अधिकारियों को प्रेषित किया।

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डॉ सिकंदर कुमार,दुमका

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