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मानवता की सेवा ही जिनका धर्म है

पहचान: जिनसे है शहर की शान

समाज सेविका शबनम खातुन: मानवता की सेवा ही जिनका धर्म है।

(झारखण्ड देखो डेस्क)

दुमका :अभी का दौर ऐसा है कि बिना स्वार्थ के कोई किसी की मदद नहीं करता। कुछ लोग करते भी हैं, तो उसका बढ़ चढ़कर प्रचार करते हैं। सौ-पचास रूपये की कोई चीज देकर फोटो खिचवाते हैं और उस फोटो को सौ से ज्यादा लोगों को भेजकर देश-दुनिया और समाज को बताते हैं कि वे बहुत बड़े समाज सेवक हैं। लेकिन ठीक इसके विपरीत समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो एक हाथ से कभी किसी को कुछ देते हैं तो दूसरे हाथ तक भी कुछ पता नहीं चलता। और यह काम वह बिना किसी स्वार्थ के चुपचाप निंरतर करते रहते हैं। हमारे शहर की एक ऐसी महत्वपूर्ण शख्सियत हैं: शबनम खातुन !

कौन हैं शबनम खातुन ?
शबनम खातुन झारखण्ड की उपराजधानी दुमका शहर के एक प्रतिष्ठित व सम्पन्न मुस्लिम परिवार की एक आदर्श समाज सेविका हैं जिनकी हमारे शहर में एक खास पहचान है। लम्बी चैड़ी कद काठी और आकर्षक व्यक्तित्व की धनी 45 वर्षीय एक ऐसी सम्पूर्ण स्त्री जिसके दिल में दीन, दुखी, बेबस लाचार लोगों के लिए अपार ममता दया और करूणा भरा पड़ा है। जाति धर्म समुदाय से ऊपर उठकर मानवता की सेवा ही जिनका धर्म और कर्म है। शबनम खातुन की शिक्षा-दीक्षा मात्र मैट्रिक तक रही है लेकिन अपने समाज के बीच पूरे शहर में एक समाज सेविका के रूप में जो उनकी प्रतिष्ठा है, वह किसी विश्वविद्यालय की डिग्री से कम नहीं है। उनके पति शमीम अख्तर अंसारी सरकारी सेवा में है। सुखद संयोग कि वे भी बड़े सरल व सज्जन व्यक्ति हैं, जिनका पूरा सहयोग शबनम जी को मिलता है। शबनम खातुन के तीन बच्चे हैं। दो बेटा एक बेटी। सबकी सोच सकारात्मक है। कोई उनके इस काम में दखलअंदाजी नहीं करता बल्कि सभी सहयोग ही करते हैं। शबनम जी कहती हैं कि उनकी शादी 1988 में हुई। माईका यूपी महाराजगंज में है। वे बताती हैं कि उनकी माता अलीमुन निशा और पिता बशीर अहमद खान भी दयालु प्रकृति रहे हैं जिनसे उन्हें विरासत में यह पारिवारिक संस्कार मिला।

समाज सेवा की भावना कब और कैसे जगी ? कितने वर्षों से कर रही हैं ?
शबनम खातुन से जब जानकारी ली गयी कि समाज सेवा की भावना उनके भीतर कब कहाँ और कैसे जगी और कितने वर्षों से वह यह काम कर रही हैं ? तब उन्होंने बताया कि अपने आस पड़ोस में जब वे किसी बेबस लाचार गरीब व्यक्ति या महिला को या फिर अनपढ़ अशिक्षित बच्चे को परेशानी में पड़ी देखती थी तो वे रात-रात भर अपने घर में चैन की नींद सो नहीं पाती थी। कई-कई दिनों तक परेशान रहती थी लेकिन घर-परिवार के बीच एक दायरे में रहते हुए, वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाती थी। जब घर से बाहर निकली सामाजिक गतिविधियों में सक्रीयता बढ़ी। देश-दुनिया में विभिन्न जगहों पर बाहर जाना-आना शुरू हुआ तो देश और समाज के प्रति एक सोच बनने लगी। घर-परिवार के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों का एहसास भी होने लगा और फिर पूरे तन मन धन से समाज सेवा में जुट गयी। शुरू-शुरू में दिक्कतें आई। आलोचना भी हुई लेकिन जब परिवार का साथ मिला तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखी और पूरे मनोयोग से मानवता की सेवा में जुट गई।

अनाथ अनपढ़ बच्चों को पढ़ाया और मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा से जोड़ा
उनके समाज के लोग बताते हैं कि शबनम खातुन ने समाज के अनाथ अनपढ़ बच्चों और दूसरे के घरों में चैका-बर्तन करने वाली लड़कियों को पढ़ा लिखाकर मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा से जोड़ा। साथ ही मानवता की रक्षा के लिए अन्य तरह के कई महत्वपूर्ण कार्य भी किये। प्रारंभ में उन्होंने अपने आस पड़ोस के गरीब लाचार भूखे नंगे लोगों को महिलाओं और बच्चों को कई तरह की छोटी-छोटी मदद दी। आगे चलकर 160 गरीब अनपढ़ बच्चों को गोद लेकर अपने खर्च पर उनको तालिम दी और फिर मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा से जोड़ा, जिनमें मुस्लिम के साथ-साथ हिन्दु समाज के बच्चे भी थे। उन 160 बच्चों में लगभग 40 बच्चियाँ थी, जिन्हें माँ-बाप लड़की होने की वजह से उन्हें स्कूल नहीं भेजते थे। गौरतलब है इस काम के लिए उन्होंने किसी से कोई सरकारी या गैर सरकारी मदद नहीं ली। सिर्फ परिजन और समाज के कुछ प्रबुद्ध व नेक लोगों का साथ मिला और यह नेक काम हो पाया।
इसी कड़ी में शबनम खातुन ने कई अनाथ बच्चों और दूसरे के घरों में चैका बर्तन करने वाली लड़कियाँ को चिन्हित किया और मैट्रिक तक पढ़ाने का पूरा जिम्मा उठायी और कई को मैट्रिक भी करवायी जो बीच में अर्थाभाव और गरीबी के कारण बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ चुके थे।

घायलों को पहुँचाया अस्पताल, गंभीर बिमारी के पीड़ितों का भी करवाया इलाज –
शिक्षा के साथ-साथ शबनम खातुन ने दुर्घटना में घायल और गंभीर बिमारी से ग्रस्त लोगों, बच्चों और महिलाओं का भी इलाज करवाया। सरकारी सुविधाओं का लाभ भी दिलवाया। पुलिस जीप से पैर गँवाने वाले आदिवासी बच्चा अभिषेक मराण्डी हो या आग में झूलसकर जिन्दगी की जंग हार चुकी मुस्लिम लड़की नरगिस। या फिर सड़क पर घायल तारकेश्वर मंडल को अपनी गाड़ी से अस्पताल पहुँचाने की बात। शबनम खातुन ने अपनी सीमा और सामथ्र्य से आगे जाकर मानवता की सेवा की।

ईद, होली, दिवाली में गरीबों के बीच मिठाईयाँ फल और कपड़े बाँटने
से लेकर चंदा और दान देने में भी आगे –
ईद हो या होली दशहरा दिवाली गरीबों में फल, मिठाई कपड़े और अनाज से लेकर रूपये पैसे तक भी वे जरूरतमंदों को समय-समय देती रहती हैं। कोई भी पर्व त्योहार हो किसी जाति धर्म का हो दान और चंदा देने यहाँ तक कि गरीब बेटी की शादी में भी शबनम खातुन हमेशा आगे रहती हैं।

समाज सेवा से राजनीति में गयी और पंचायत चुनाव भी लड़ी –
शबनम खातुन जब अपने सामाजिक कार्यों से चर्चा में आई तब कई राजनीतिक दलों से उनके पास राजनीति में आने का आॅफर मिला। बहुत सोच-विचार और सलाह मशवरा के बाद वह झारखण्ड की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में गई और पिछले 10 वर्षों से वह राजनीति में सक्रीय है। इसके पीछे उनकी सोच, अपने सामाजिक कार्यों को और बेहतर और मजबूत तरीके से करने की रही। इस दौरान वह एक बार जिला परिषद सदस्य के लिए पंचायत चुनाव भी लड़ी और बहुत ही कम मतों से पीछे रह गई। लेकिन अपने बेहतर प्रदर्शन से जनता के बीच अपनी सशक्त पहचान बनाने में सफल रही। शबनम खातुन वर्तमान में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा दुमका में पार्टी की जिला सचिव हैं।

मदर टेरेसा, दिशोम गुरू शिबू सोरेन, सर्वमान्य नेता अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गाँधी हैं इनकी आदर्श 

शबनम खातुन से जब समाज सेवा और राजनीति में उनके आदर्श के बारे में पुछा गया तो उन्होंने जहाँ एक ओर समाज सेवा में मदर टेरेसा को अपना आदर्श बताया वहीं दूसरी ओर राजनीति में क्षेत्रीय स्तर पर दिशोम गुरू शिबु सोरेन को और राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी और आयरन लेडी व देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गाँधी को अपना आदर्श बतलाया।

आगे का लक्ष्य और सपना 
शबनम खातुन से जब उनके आगे का लक्ष्य और उनके सपनों के बारे में पुछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं मुख्यतः एक समाज सेविका हूँ। मुझे समाज सेवा करना अच्छा लगता है और उससे आत्मिक संतुष्टि भी मिलती है। राजनीति हमारी दूसरी प्राथमिकता है, वह भी अपने सामाजिक कार्य को और भी बेहतर और मजबूती से करने के लिए न कि विधायक सांसद मंत्री बनने के लिए। हाँ, एक सपना जरूर है कि हमने जिन बच्चों को पढ़ाकर आगे बढ़ाया उनमें से कोई सेना में जाकर सरहद पर देश की रक्षा कर सके तो हमें बहुत खुशी होगी।

अबतक कहीं से कोई पुरस्कार या अवार्ड नहीं मिला फिर भी निराशा से नहीं आशा और उम्मीद से भरी हैं शबनम खातुन

शबनम खातुन को अबतक कहीं से कोई अवार्ड या सम्मान नहीं मिला, जबकि आये दिन बड़ी संख्या में पुरस्कार और अवार्ड बँटते रहते हैं। जिनका कभी कोई सामाजिक सरोकार नहीं रहा, वे समाज सेवा का पुरस्कार पा रहे हैं। फोटो खिंचवाते और सुर्खियों में हमेशा बने रहते हैं लेकिन अफसोस है कि भीड़ से अलग काम करने वाली और सस्ती लोकप्रियता व प्रचार-प्रसार से दूर सच्चे अर्थों में समाज सेवा करने वाली शबनम खातुन पर अबतक किसी संस्थान की नजर नहीं पड़ी। फिर भी वह निराशा नहीं, आशा और उम्मीद से भरी हैं। यही उनके व्यक्तित्व की पहचान है, जिससे शबनम खातुन अपने शहर व समाज में जानी और मानी जाती हैं। उनकी यही पहचान हमारे शहर की शान।

(दुमका से अशोक सिंह की रिपोर्ट)

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