दुमका (जरमुंडी): शिक्षा के मंदिर जिन्हें बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह माना जाता है, जब वहीं से क्रूरता और प्रताड़ना की खबरें आने लगें, तो पूरे समाज का चिंतित होना लाजमी है। झारखंड के दुमका जिले के जरमुंडी स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में 9वीं कक्षा की एक छात्रा के साथ जो हुआ, उसने न सिर्फ स्कूल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरे शिक्षा और प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता को भी उजागर कर दिया है।
खौफ की वह रात: क्या हुआ था 18 मार्च को?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह पूरी घटना 18 मार्च की रात की है। प्रार्थना के बाद कक्षा में कुछ शोर-शराबा हो रहा था। आरोप है कि इस शोर-शराबे का पूरा दोष 9वीं की एक मासूम छात्रा पर मढ़ दिया गया। इसके बाद जो हुआ, वह ‘अनुशासन’ की आड़ में की गई अमानवीयता की पराकाष्ठा थी। शारीरिक शिक्षिका (पीटी टीचर) सुहागिनी मरांडी पर आरोप है कि उन्होंने छात्रा को एक कमरे में बंद कर दिया और डंडे से उसकी बेरहमी से पिटाई की। क्रूरता यहीं नहीं रुकी; पीड़िता के पिता का यह भी आरोप है कि उनकी बेटी के पेट में लात तक मारी गई, जिससे उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि उसे आनन-फानन में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
धमकी और रसूखदारों का ‘सफेदपोश’ खेल
इस दर्दनाक घटना के बाद स्कूल प्रबंधन का रवैया और भी ज्यादा शर्मनाक रहा।
- मामले को दबाने की कोशिश: आरोप है कि विद्यालय की वार्डन नेहा वर्मा ने छात्रा को न्याय दिलाने के बजाय मामले पर पर्दा डालने की पूरी कोशिश की। पीड़िता को डराया गया कि यदि उसने इस घटना का जिक्र किसी से किया, तो उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा।
- सफेदपोशों का दखल: स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि पर्दे के पीछे से कुछ रसूखदार ‘सफेदपोश’ लोग इस पूरे मामले को रफा-दफा करने के प्रयास में जुटे हैं।
- शिक्षिका का बेतुका तर्क: वहीं, आरोपी शिक्षिका सुहागिनी मरांडी का यह कहकर अपना बचाव करना कि “अनुशासन बनाए रखने के लिए सख्ती जरूरी है”, यह दर्शाता है कि प्रबंधन बाल अधिकारों को लेकर कितना लापरवाह है।
बाल कल्याण समिति (CWC) की भूमिका पर उठते सवाल
बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई बाल कल्याण समिति (CWC) की इस पूरे मामले में चुप्पी और निष्क्रियता बेहद संदिग्ध है। परिजनों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि समिति ने वह संवेदनशीलता नहीं दिखाई जिसकी उनसे अपेक्षा थी। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सिस्टम ही रक्षकों को बचाने में जुटा है? परिजनों का तो यहाँ तक कहना है कि विद्यालय में छात्राओं के साथ मारपीट की यह कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन डर के साये में बच्चियाँ हमेशा चुप रह जाती हैं।
कानूनी पहलू: “यह सिर्फ मारपीट नहीं, अपराध है”
इस घटना पर बाल अधिकार विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. अमरेन्द्र कुमार यादव ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
“यह घटना अत्यंत निंदनीय है। बच्चों के साथ इस प्रकार का शारीरिक और मानसिक दुर्व्यवहार पूरी तरह अस्वीकार्य है। यह न सिर्फ बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन है, बल्कि किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) के तहत एक गंभीर और दंडनीय अपराध है। प्रशासन को चाहिए कि वह दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करे।”
जनता और परिजनों की प्रमुख मांगें
अस्पताल के बिस्तर पर दर्द से कराहती छात्रा और न्याय की गुहार लगाते उसके परिवार ने प्रशासन के सामने कुछ स्पष्ट मांगें रखी हैं:
- आरोपी शारीरिक शिक्षिका और मामले को दबाने का प्रयास करने वाली वार्डन के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कर सख्त कार्रवाई की जाए।
- इस पूरे प्रकरण में बाल कल्याण समिति (CWC) की संदिग्ध भूमिका की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच हो।
- पर्दे के पीछे से मामले को प्रभावित कर रहे ‘सफेदपोश’ लोगों को बेनकाब किया जाए।
- पीड़िता का बेहतर और निशुल्क इलाज सुनिश्चित हो तथा उसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाए।
निष्कर्ष: दांव पर है समाज का विश्वास
यह सिर्फ जरमुंडी के कस्तूरबा विद्यालय की एक छात्रा की पिटाई का मामला नहीं है। यह सीधे तौर पर शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही, बच्चों के मौलिक अधिकारों और सिस्टम की पारदर्शिता से जुड़ा मुद्दा है। यदि समय रहते इस मामले में कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो आवासीय विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजने वाले गरीब और आदिवासी परिवारों का भरोसा प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था से हमेशा के लिए उठ जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में न्याय की मिसाल पेश करता है या फिर यह फाइल भी रसूखदारों के दबाव में कहीं दबकर रह जाएगी।







