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सेन्ट्रल कोल ब्लॉक पचुवाड़ा से आठ वर्ष पूर्व विस्थापित परिवारों की हालत दयनीय

सेन्ट्रल कोल ब्लॉक पचुवाड़ा से आठ वर्ष पूर्व विस्थापित न्यू कठालडीह के 86 परिवार आवादी लगभग 400 विस्थापित परिवारों की हालत वर्तमान में दयनीय है।

सेन्ट्रल कोल ब्लॉक पचुवाड़ा से आठ वर्ष पूर्व विस्थापित न्यू कठालडीह के 86 परिवार आवादी लगभग 400 विस्थापित परिवारों की हालत वर्तमान में दयनीय है। बीते एक साल से कोल परियोजना के बंद हो जाने से विस्थापितों का जीवन बेपटरी हो चूका है। जंगलों से पत्ता, महुआ, लकड़ी चुन बाजार में बेचकर ये जीवन यापन जीने को मजबूर हैं। कोल परियोजना को जीने का आधार मान कर अपनी सारी जमीन दे चुके थे । आज ये विस्थापित शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, पानी, बिजली से वंचित आज दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। रोजगार की तालाश में बंगाल पलायन करने को मजबूर है। आज कल इतनी बेरोजगारी है की विस्थापित परिवारो महुआ को उबाल कर खाने को मजबूर है।

क्या कहते हैं विस्थापित?

  • वकील सोरेन ने कहा कि हमसबों की सारी जमीन जा चुकी है। जीने का स्थायी आधार छिन चूका है। रोजगार का कोई दूसरा उपाय नहीं है।
  • नायकी सोरेन ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि जब परियोजना चालू था तब करीब 7 हजार रुपए प्रति माह मिल जाता था। भोजन में परेशानी नहीं होती थी। बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी अलग से मिलता था। अब समझ में नहीं आता कि क्या करे।
  • दुर्गा मरांडी ने भी परियोजना के बंद हो जाने से स्वयं को बेरोजगार और आर्थिक परेशानी में बताया।
  • साहेब सोरेन ने कहा कि अब मजदूरी के लिए बाहर जाने के अलावे कोई रास्ता नहीं। जमीन तो है नहीं कि फसल उपजा सकूँ।
  • सकल मुर्मू ने अपना दर्द बताते हुए कहा कि एक साल से एक रुपए का भी इनकम नहीं है। परिवार चलाना भी मुश्किल हो रहा है। परियोजना के चालू हो जाने से ही हम सबों को राहत मिलेगा।

विस्थापितों ने कहा कि बीते एक साल के दौरान हमारी शुधि न तो प्रशासन ने लिया और न ही प्रबंधन ने। हमलोग चिकिसा, बिजली, पानी, रोजगार जैसी आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित हो चुके हैं। बाहर पढ़ने वाले हमारे लगभग बीस बच्चों की पढ़ाई बाधित है। गाँव में सरकारी स्तर पर कोई काम भी क्रियान्वित नहीं है।

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परियोजना शीघ्र चालू हो।

विस्थापितों ने बंद पड़ी परियोजना को शीघ्र चालू करने की मांग भी सरकार से किया है।

क्या कहते हैं ग्रामप्रधान?

ग्रामप्रधान मंगल सोरेन ने कहा कि विस्थापित भूखमरी की कगार पर हैं। सरकार व् प्रशासन को परियोजना को आरम्भ करने की दिशा में ठोस पहल करना चाहिए। अन्यथा रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए।

क्या कहते हैं प्रशासन व् प्रबंधन के अधिकारी?

स्थानीय बीडीओ विजय कुमार ने बताया कि सम्बंधित पंचायत आलूबेड़ा में मनरेगा के कार्य संचालित हैं।बेरोजगार निबंधित मजदूरों को काम की मांग पर कार्य उपलब्ध कराया जाता है।

क्या कहते पैनम अधिकारी?

परियोजना प्रबंधन के स्थानीय अधिकारी जेम्स मुर्मू ने बताया कि सेंट्रल कोल ब्लॉक का निकट भविष्य में आरम्भ होना मुश्किल है। अभी लंबी क़ानूनी प्रक्रिया बाकी है। लीज़होल्डर पीएसईबी के हाथ से यह ब्लॉक जा सकता है। सरकार फिर नए सिरे से कोल ब्लॉक आवंटन का कार्य कर  सकती है।

~ विनोद रविदास द्वारा ईमेल से प्रेषित (binodpakur2014@gmail.com)

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