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बढ़ते आत्महत्याओं की व्यथा, तनावमुक्त हो संकुचित व्यवस्था

लेखक:डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रो सह नैदानिक मनोवैज्ञानिक
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग,
एस पी कॉलेज, दुमका।

झारखण्ड देखो डेस्क :बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं किसी भी सभ्य समाज के लिए ना केवल एक चुनौती होता है बल्कि एक अभिशाप भी। जहां मानव मूल्यों की सुरक्षा हेतु प्रत्याशित व्यवहार किया जाना चाहिए वहीं उनके भावनाओं की ना केवल अनदेखी होती है बल्कि खिलबाड़ भी किया जाता है।
आत्महत्या की वजहें जो भी हो पर इस तरह से मानवमूल्यों की हानि होना एक चिंता का विषय है। इस बारे में ना केवल चिंतन मनन की जरूरत है बल्कि ऐहतियाती तौर पर ईमानदारी पूर्वक कदम उठाने की भी जरूरत है। अखबारों के माध्यम से लोगों को चेताया जाना कि आत्महत्या करना एक दंडनीय अपराध है बावजूद आत्महत्यायें हो रही है। इस बाबत कानूनी बातों की डर भी बेअसर साबित हो रहा है। यूँ कहे कि लोगो को डराने धमकाने से भी आत्महत्या रुकने वाला नही मालूम पड़ता है। ऐसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में गिरते हौसलों को बुलंद करने के लिए मनोविज्ञान का सहारा आवश्यक हो जाता है।
आत्महत्या की रोकथाम में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सुझाये गए उपायों को अमल में लाने की सख्त जरूरत है। मनोचिकित्सीय तकनीकों व सामाजिक सिद्धांत को अपनाकर व व्यवहारिक बनाकर जीवन मे चलने की आवश्यकता है तभी समाज मनोवैज्ञानिक अब्राहम मसलों के आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धान्त के तहत सामाजिक सुरक्षा व मानव मूल्यों के मध्य आत्म-सम्मान की जिंदगी जी सकेंगे।
अब सवाल उठता है कि आत्महत्या की घटनाओं (जैसा कि आए दिन अखबारों की सुर्खियों में आत्महत्या की लगातार खबरे छपती रहती है) में अचानक इतनी वृद्धि क्यों? क्यों लोग परिस्थितियों से सामना करने के बजाय मौत को ही जीवन की झंझटों व चिंताओं से स्थाई छुटकारा के तौर पर एक बेहतर विकल्प के रूप में चुनते है? क्यो लोग जिंदगी से इतना अधिक निराश चल रहे है? क्यों उनके संवेगों पर नियंत्रण रह नही पा रहा है? ऐसा अपमानजनक वातावरण क्यों? आदि-आदि कई सवाल इस संदर्भ में उठ खड़े हो सकते है। लेकिन तर्क यहां यह भी है कि इन सवालों पर तर्क-वितर्क करने के बजाय बेहतर कदम होगा कि समाज मनोविज्ञान के आईने में उन कारणों को जाने व समझे कि क्यों ऐसा हुआ और आगे ऐसा नही हो यानि आत्महत्या के कारण मानवीय मूल्यों की क्षति ना हो,के उन उपायों को यथार्थ दृष्टिकोण से सोचे ताकि इस दुःख व अपसन्दनीय व्यवहार पर नियंत्रण पाया जा सके।
आत्महत्या एक संवेगात्मक पहलू है जिसमे वर्त्तमान विषम परिस्थितियां आग में घी का काम करती है। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्त्तमान में बढ़ती आत्महत्या के कारणों में कोविड-19 यानि कोरोना के दुष्प्रभाव से हुए लॉक डाउन के कारण उत्पन्न संवेगात्मक विक्षोभ को नजरअंदाज नही किया जा सकता है।
इन सभी बातों को समाज मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण कर कारणों को जाने तत्पश्चात इसके रोकथाम के उपायों की सोचे जरूरत है कि आत्महत्या क्या है? क्यों ऐसी घटनाओं में इजाफा हो रहा है? क्या इसे रोकने के मनोवैज्ञानिक उपाय हो सकते है? जिंदगी तनावमुक्त रहे इसके लिए भी जरूरी है कि क्रमशः इन बातो पर गौर फरमाये:
1. आत्महत्या क्या है: आत्महत्या से तात्पर्य अपने को मौत के गले लगा लेना है। वो तरीका कुछ भी अपनाया जा सकता है जो तात्कालिक संवेगात्मक विक्षोभ की मात्रा व उग्रता पर निर्भर करता है।
2. ये आत्महत्या क्यो? इस आत्महत्या के कई समाज मनोवैज्ञानिक पहलुए हो सकते है:
1. कमजोर अहम (अहम- जो वास्तविकता के सिद्धांत पर काम करता है) : कमजोर अहम वाले हमेशा पलायन वादी स्वभाव के होते है जब इनके सामने विषम व तनावपूर्ण परिस्थितियों से सामना करने की स्थिति उत्पन्न होती है वो डर जाता है व अविवेकी निर्णय लेकर आत्महत्या करने की गलत कदम उठा लेते है।
2. आंतरिक आक्रामकता: जब व्यक्ति चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से सामना नही कर पाता है तो निराशाओं से भर जाता है। वो विषाद से इतना अधिक भर जाता है कि वो कुछ भी गलत करने की ठान लेता है। उतना उग्र भावना में वो जब दूसरे को नुकसान नही पहुंचा सकता है तो वो आंतरिक आक्रामकता का शिकार हो खुद को नुकसान कर लेता है।
4. सामाजिक निंदा: लोग गरीबी में जिंदगी जी लेगा, तकलीफे सारी झेल लेगा लेकिन लोगों की रोज-रोज की निंदा व आलोचना उसे चैन से जीने नही देती। गलत कदम ही सही तंग आकर एक दिन जिंदगी से हाथ धो बैठता है। समाज मे ऐसी बहुत सी घटनाएं इसका उदाहरण है। जैसे परीक्षा में फेल होने से, दुष्कर्म का शिकार होने से, लोगों के बीच अपमानित किये जाने से, इमोशनल व शारीरिक ब्लैकमेल किये जाने से, आदि की सामाजिक निंदा से बचने का एकमात्र विकल्प शेष दिखाई देता है।
5. कमजोर सहनशीलता: आज के दौर में देखे तो यह आम व्यवहार हो चला है। लोग दूसरे की बातों को ना तो बर्दाश्त करना चाहता है और ना ही धैर्य के साथ परिस्थितियों से सामना। ऐसे लोगो का आत्मविश्वास भी उतना ही कमजोर होता है। अविवेकीपन व उतावले में आ भी खुद के जान के आफत बन जाते है।इस तरह के स्वभाव का परिचय नई पीढ़ी के युवाओं में खासकर के देखने को मिलता है।
6. प्रतियोगी भावना व विलासी चाहत: यह वर्त्तमान की एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है। आमदनी चाहे जो भी हो औरों से कम नही रहना है। महंगी मोबाइल हो ,गाड़ी, घर, गहने, शिक्षा, या फिर आउटिंग करना व महंगे होटलो में खाने जैसी जिदें भी घर की खुशियां व संतुलन बिगाड़ दिया है जिससे तंग आकर पति हो या पत्नी, या फिर प्रेमी हो या प्रेमिका किसी एक को इसकी कीमत चुकानी पड़ जाती है।
7. संवेगात्मक वंचना या अवरोध: सबसे अहम बात है कि लोग बिना बतियाये जानवरों की चुप जिंदगी जी नही सकते। लोगों को खाना एक दिन ना मिले बर्दाश्त हो सकता है लेकिन मन की बातें बोले बिना चैन से रह नही सकता। पागल को भी संवेगात्मक अभिव्यक्ति जरूरी होता है। कोरोना के लॉक डाउन ने मानो सामाजिक संवेगात्मकता पर ना केवल पहरा बैठा दिया बल्कि स्वच्छंद अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध भी लगा दिया हो। जो ऐसा युवा के साथ-साथ घर के बुजुर्गों पर ज्यादा प्रभाव डालता है। ऐसे डरावने हालात में ना केवल लोगों आत्मविश्वास को कमजोर बनाया, घरेलू हिंसा का शिकार बनाया, चिड़चिड़ा स्वभाव का बनाया ,उन्हें एक तरह से बेकार साबित किया बल्कि नकारात्मक विचारों से उसके मन को तनावों व विषादों से भर भी दिया जिसके घुटन ने लोगो को कुछ ऐसा गलत उठाने को मजबूर किया।
7. सामाजिक क्षति: जीवन मे ऐसे भी हालात आते है जिसमे वर्त्तमान लॉक डाउन भी शामिल हो सकता है जिसे लोग बर्दाश्त नही कर पाते है और मर जाना ही बेहतर समझते है। जैसे परिवार में पति की मृत्यु, एकलौते संतान की मौत, व्यापार का डूब जाना, आर्थिक दिवालिया हो जाना, कंपनी में आग लग जाना, अचानक नौकरिविहीन या बेरोजगार हो जाना आदि हालात भी कुछ प्रतिशत में सही आत्महत्या का कारण अवश्य बनता है।
8. आत्मग्लानि व हीनता की भावना: कभी-कभी लोग गलत कार्यो की आत्मग्लानि से तो कभी लोग अपने मनोशारीरिक अक्षमता के तंग भाव से आत्महत्या के कदम उठाते है।
9. उपेक्षा व अपमान की स्थिति में: यह बात उन किशोर व नवयुवकों से गुजरती है जो मामूली बात के इनकार पर घोर अपमानित समझते है और गुस्से में ये मौत के कदम उठा लेते है।
10. जीवन शैली: वर्त्तमान युवा अपनी जीवन शैली से समझौता करने के मूड में नही होता है। हो हर हाल में अपनी मर्जी चलना चाहता है। उसे किसी का सलाह नही चाहिए। पसंद के कार्य व्यवहार नही होने से घर छोड़ने व मर जाने को धमकी देते है। जिद्द पूरी नही होने पर आत्महत्या कर लेते है।

3. क्या हो बचाव के उपाय: यूँ तो मनोचिकित्सा की दृष्टि से बात करे तो संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा व सतत समाज मनोवैज्ञानिक परामर्श ज्यादा कारगर साबित होता है। और इसका लाभ तभी मिलेगा जब आप स्वयं को इच्छुक व तैयार कर ले। या लोग आपको वहाँ तक का मार्गदर्शन दे।
बात आत्महत्या तक ना जाये प्रीवेंशन अर्थात रोकथाम के बल कई जिंदगियों को यूं बर्बाद होने से बचाया जा सकता है वशर्ते कि उन उपायों पर अमल किया जाय।
1. धैर्य रखना: लोगों को विषम परिस्थितियों में धैर्य रखना आना चाहिए। अनुभवी से सीखना भी चाहिए।
2. परिस्थितियों का तार्किक विश्लेषण हो: हर एक परिस्थिति नई चुनौती के साथ संग अपने लोगों के तनाव भी लाती है। अतः यहां इन परिस्थितियों को तर्क के कसौटी पर रखकर समाधान के उपाय तलाशनी चाहिए ना कि पलायन करनी चाहिए।
3. आत्मविश्वास को कमजोर ना होने दे: जीवन मे चुनौतियां जैसी भी मन का विश्वास नही खोना चाहिये और ना ही अपने अहम को कमजोर होने देना चाहिये। ये व्यक्ति विशेष का रामबाण है जो अंधेरो को चीरता हुआ लक्ष्य को भेद देता है।
4. प्रॉब्लम सॉल्विंग यानि समस्या समाधान की नीति चले: कोई भी समस्या है उसे टुकड़ो में बांट उसके प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करें व उसका क्या और कैसे समाधान होगा इस नीति को अपनाकर चलने से विषाद कभी समीप नही आएगा।
5. समस्याओं में आनंद के साथ जीना सीखे: यह बातें कोरोना क्या जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आने वाली समस्याओं के संदर्भ में हो सकती है कि एक बार इन नकारात्मक हालातों में आनंद के साथ लोग जीना सीख ले तो कभी लोग निराश होने की नही सोचेंगे। उदासीनता दूर जा बसेगी।
6. तुलनात्मक व प्रतियोगी भावना को छोड़े: संतोष व शांति के वातावरण में जीने का एक अच्छा उपाय है कि आप अपने क्षमता व आमदनी के भीतर जीवन जीना सीखे। प्रेम से खुश रहना सीखें।
7. आध्यत्म चिंतन करें: आप संयम, धैर्य व आत्मविश्वास के साथ निर्णय ले व कदम उठाए जरूरी है कि अध्यात्म को जीवन मे अपनाए व परिवार के लोगो को भी अच्छी बातों की सीख दे। जो सबके लिए संभव है।
8. सोशल मीडिया के बुराइओं व भ्रामक खबरों से दूरी बनाए: ये लोगों में तरह-तरह के सांवेगिक उपद्रव मचाते है जिसका प्रभाव घर के सदस्यों व समाज पर भी नकारात्मक रूप से पड़ता है और सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है जो तनाव, चिंता व विषाद का कारण बनता है। जरूरत है इससे दूरी बनाकर चलना जो हमारे नियंत्रण की बात है।
9. रक्षा प्रक्रमो का व्यवहार करें: हर व्यक्ति में संतुलित, समायोजित व यथार्थ जिंदगी जीने के लिए आत्म रक्षार्थ हेतु रक्षा प्रक्रम होते है जिसे अपनाकर चलने से विषादी भावना नियंत्रण में होती है। इनमें दमन, प्रक्षेपण, उदात्तीकरण, तार्किकरण, विस्थापन, स्थानांतरण, शमन, अस्वीकरण, बौद्धिकरण, आदि प्रमुख है। इसका इस्तेमाल मजबूत व स्वास्थ्य अहम की पहचान है।
11. उत्तम तरीके का समाजीकरण करे: ऐसे लोगो के साथ बात करे, व्यवहार करें व दोस्त बनाये जो परनुभूतिक भाव (यानि अपने जैसा ही आपको समझे व सम्मान दे) से लबरेज हो। मतलबी संबंध वक़्त पर धोखा भी दे सकता है जो तनावों व विषादों का कारण बनते है। इस वांछित दिशा में सरकार, नेता व प्रशासन को विशेष रूप से पहल करने की आवश्यकता है।

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