पुलिस ने शुक्रवार देर रात जिले की कई वारदात में शामिल नक्सली जोनल कमांडर कंचन दा उर्फ अवध किशोर यादव उर्फ मोटा को मसलिया प्रखंड के झंडा पहाड़ से उसके दो साथियों के साथ गिरफ्तार किया। उनके पास से नक्सली साहित्य, 35 हजार रुपये, मोबाइल, शक्तिवर्धक दवाइयां, 63 रासायनिक जेल व 250 डेटोनेटर बरामद किया गया। दस लाख के इनामी नक्सली कंचन दा जामताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड के अहरडीह गांव का रहनेवाला है। उसके सहयोगी वकील मुर्मू व गोपाल राय मसलिया प्रखंड के बसमत्ता गांव के निवासी बताए गए। शनिवार को एसपी प्रभात कुमार ने इस संबंध में जानकारी दी। एसपी ने बताया कि कंचन को गिरफ्तार करने में कामयाबी नहीं मिल रही थी। शुक्रवार को उसके झंडा पहाड़ पर होने की सूचना मिली। इसके बाद डीआइजी के निर्देश पर टीम बनायी गई। एसएसबी की दो टीम व जिला पुलिस के सहयोग से कंचन यादव को गिरफ्तार किया गया। उसकी निशानदेही पर बसमत्ता से गोपाल व वकील को दबोचा गया।
बताया कि कंचन यादव पर सरकार ने दस लाख रुपये का इनाम घोषित किया है। मिलनेवाली राशि गिरफ्तार करने वाली टीम के सदस्यों के बीच बांट दी जाएगी। बताया कि कंचन के पास से लेवी के रुपये भी बरामद किए गए हैं। जल्द ही रिमांड पर लेकर आगे की पूछताछ की जाएगी। डीएसपी अशोक कुमार की अगुवाई में मसलिया के पूर्व थानेदार महेश प्रसाद सिंह, जामा के फागुनी पासवान, काठीकुंड के सचिन दास, मसलिया के अमित लकड़ा, काठीकुंड के पुलिस निरीक्षक अनिल सिंह व एसएसबी जवानों की टीम ने कंचन को गिरफ्तार करने के लिए छापेमारी की। झंडापहाड़ पर पहुंचना संभव नहीं था। टीम काफी मशक्कत से पहाड़ पर चढ़ी और उसे धर दबोचा। इस क्रम में डीएसपी चोटिल भी हो गए।

कई मामलों में था शामिल
कंचन शिकारीपाड़ा के थानेदार शमशाद अंसारी, काठीकुंड के सदानंद सिंह, मसलिया में ठेकेदार की हत्या, शिकारीपाड़ामें मुठभेड़ व पाकुड़ एसपी अमरजीत बलिहार हत्याकांड में शामिल रहा है। पहले यह नक्सली वारदात को अंजाम देता था, लेकिन अब विचारक बन गया। यह माओवाद का सिद्धांत समझाकर नए लोगों को संगठन से जोड़ता था। इसी उददेश्य से मसलिया आया था। इस कार्य में गोपाल राय व वकील मुर्मू सहयोग करते थे। इन दोनों का कोई आपराधिक इतिहास अभी तक पता नहीं चला है।कुंडहित के अलावा प्रमंडल के अन्य जिलों से संपर्क किया जा रहा है।
होमगार्ड जवान से नक्सली बना कंचन
जोनल कमांडर का दर्जा मिलने से पहले कंचन दा होमगार्ड जवान था। 80 के दशक में वह धनबाद में तैनात था और रसोइया के रूप में काम करता था। 1984 में उसकी पत्नी की हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद वह पूरी तरह टूट गया और बदला लेने के उद्देश्य से नक्सली संगठन से जुड़ गया। 1997 से वह पूरी तरह से नक्सलियों के लिए काम करने लगा। आज ताला दा के बाद उसका ही संगठन में स्थान है। एसपी प्रभात कुमार ने बताया कि प्रारंभिक पूछताछ में कंचन ने स्वीकार किया कि पत्नी की हत्या के बाद वह नक्सलियों के संपर्क में आया। 50 साल का कंचन पहले हर बड़ी वारदात में शामिल रहता था। संताल परगना में ताला दा की तूती बोलती थी। उसके जेल जाने के बाद कंचन को सारी जिम्मेदारी सौंप दी गई।








