
झारखण्ड देखो डेस्क :-देश में विदेशी साम्राज्यवाद के खिलाफ 8 अगस्त 1942 को घोषित राष्ट्र व्यापी भारत छोड़ो आन्दोलन के ठीक दो वर्ष पूर्व जन्मे डा.मधुसूदन मधु (8 अगस्त ) संताल परगना में स्वतंत्र,सजग और निर्भीक पत्रकारिता के जनक 1940-28 मार्च 2006,ग्राम चिकनियाँ,प्रखंड-जामा जिला दुमका) ने अपनी लगन,मिहनत और ईमानदारी से संताल परगना में स्वतंत्र,सजग और निर्भीक पत्रकारिता की नींव डाली । बेहद सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि में महज 38 वर्ष की उम्र में उन्होंने वर्ष 1978 में दुमका दर्पण की शुरुआत की और आगामी 28 वर्षों तक इसका सफलतापूर्वक सम्पादन और प्रकाशन किया।

संताल परगना के पत्रकारिता के इतिहास में उनके द्वारा स्थापित यह गौरवशाली रिकार्ड आज तक कायम है। 42 वर्ष पूर्व अविभाजित संताल परगना जिला के मुख्यालय दुमका से समाचार पत्र निकालना कोई साधारण काम नहीं था क्योंकि आज की तरह उस समय समाचार प्रेषण हेतु सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं और संचार के साधन भी विकसित नहीं थे। रेल परिचालन की व्यवस्था नहीं थी और सड़क परिवहन भी काफी सुगम्य नहीं था। समाचार, आलेख आदि डाक द्वारा भेजे जाते थे। काफी महत्वपूर्ण और किसी बड़ी वारदात से सम्बन्धित समाचार के समयोचित प्रकाशन हेतु काफी परिश्रम करना पड़ता था।इसके अलावा सब से बड़ी परेशानी यह थी कि पत्रकारिता का पेशा बहुत विकसित और लोकप्रिय नहीं था। आम लोगों का दृष्टिकोण इसके प्रति सकारात्मक और उत्साहबर्धक नहीं था। इन सब जमीनी समस्यायों के अलावा उनके सामने आर्थिक तंगी एक बड़ी परेशानी थी। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अगस्त 1978 दुमका दर्पण (पाक्षिक)का सम्पादन और प्रकाशन (अलका प्रेस,दुमका) शुरू कर दिया। संताल परगना की पत्रकारिता के इतिहास में यह मील का पत्थर साबित हुआ क्योंकि बहुत ही थोड़े समय में इसने जन लोकप्रियता हासिल कर ली और संताल परगना के अधिकांश क्षेत्रों में यह प्रसारित-प्रचारित हो गया। पर वे रूके नहीं बल्कि उनका अथक बेमिसाल प्रयास जारी रहा और वे सम्पादक मधुजी के नाम से प्रख्यात हो गये। इसके फलस्वरूप उन्हें आम लोगों को पत्रकारिता की महत्ता को समझाने में कामयाबी हासिल हुई।आम लोगों को उन्होंने सफलतापूर्वक बताया कि प्रेस लोकतंत्र का चौथा मजबूत और स्थायी स्तम्भ है। एक पत्रकार और सम्पादक के रूप में यह उनकी कई बड़ी उपलब्धियों में शीर्ष पर है। इतना ही नहीं उन्होंने अनेक युवकों को दुमका दर्पण के साथ जोड़कर उन्हें पत्रकारिता की प्रारम्भिक शिक्षा दी और उनके द्वारा प्रेषित समाचारों को दुमका दर्पण में प्रकाशित कर उनका हौसला अफजाई किया।उन्होंने किसी प्रकार की कोई राजनीति नहीं की और स्वतंत्र रूप से ईमानदारीपूर्वक पत्रकारिता के पेशे से जुड़े रहे। दुमका दर्पण से जुड़े अधिकांश लोगों को पोस्टकार्ड प्रेषित करने की उनकी बेजोड़ सोंच वर्षों तक जारी रही जिसमें उनके निर्देशों की भरमार होती थी। इस प्रकार संताल परगना में पत्रकारिता के लिए उर्वर भूमि तैयार करने में उन्होंने अद्वितीय योगदान किया।
संताल परगना प्रमंडल के कई बुद्धिजीवी और युवक उनसे जुड़ गये जिन्होंने सहर्ष पत्रकारिता का पेशा अपनाया। यह सब कुछ उनकी मिहनत और लगन का प्रतिफल था जिससे वे इतने उत्साहित हुए कि वर्ष 1983 में अपना प्रेस (निराला प्रिंटिंग प्रेस,जिला स्कूल रोड,दुमका) स्थापित करने के बाद अगस्त 1984 से उन्होंने दुमका दर्पण का पाक्षिक से साप्ताहिक प्रकाशन शुरू कर दिया और आगामी दो दशक से भी ज्यादा समय तक इसका सफलतापूर्वक सम्पादन और प्रकाशन किया। यह भी अपने आप में उनका एक बेजोड़ रिकार्ड है। और तो और,स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर उन्होंने निर्भीक होकर लिखा और निर्भीक लेखन का प्रशिक्षण भी उन्होंने दुमका दर्पण से जुड़े पत्रकारों को दिया। इस प्रकार अपने पत्रकारिता जीवन के 28 वर्षों के लम्बे इतिहास में मधुजी ने एक सम्पादक और प्रकाशक के रूप में असाधारण कार्य किया और अपनी मिहनत,लगन और ईमानदारी से संताल परगना में स्वतंत्र,सजग और निर्भिक पत्रकारिता की नींव डाली। उन्होंने दुमका दर्पण में संताल परगना के लेखकों,कवियों,इतिहासकारों आदि की रचनाओं को प्रथमिकता देकर अपनी निष्पक्षता ओर दूरदर्शिता का परिचय दिया। विभिन्न अवसरों और राष्ट्रीय दिवस के मौके पर उन्होंने बड़ा ही शानदार,आकर्षक, रंगीन और अनेक सूचनाओं व विभिन्न महत्वपूर्ण तथ्यों से परिपूर्ण दुमका दर्पण के कई विशेषांक प्रकाशित किये। दुमका दर्पण के नियमित अंकों के अलावा विशेषकर इन विशेषांकों ने एक पत्रकार,सम्पादक और प्रकाशक के रूप में उनकी कर्मठता, निर्भीकता और जुझारूपन को प्रामाणित कर दिया। उन्होंने आम लोगों के सामने बेहतरिन तरीके से उच्चकोटि की पत्रकारिता पेश की और सर्वसाधराण को इसके डेमोक्रेटिक मूल्य और महत्ता से अवगत कराया। यह महज उनके प्रयास का ही प्रतिफल था कि दुमका दर्पण संताल परगना के कोने कोने में पहुंच गया। दुमका दर्पण के एक दशक (1978-1988) पूरे होने पर गोविन्द प्रसाद केजरीवाल(दिल्ली),प्रफुल्ल चन्द्र पट्टनायक(स्वतंत्रता सेनानी, बरपाली,उड़ीसा),बलिराम महतो हरिचेरा,(महेशपुरराज,साहिबगंज),अशोक राय (देवघर), दिनेश नारायण वर्मा (बरहरवा) जयनारायण राय(देवघर),सुनील हेमरम (कुंडहित), सच्चिदानन्द पाठक (कटिहार) और विश्वनाथझा (हेडमास्टर,हंसडीहा)आदि अनेक बुद्धिजीवियों ने एक पत्रकार, सम्पादक और प्रकाशक के रूप में उनकी और उनके बेजोड़ लेखन-कार्य की सराहना और प्रशंसा की। इसने उनके भविष्य का रास्ता प्रशस्त कर दिया। सबसे बड़ी बात यह हुई कि संताल परगना के अनेक बुद्धिजीवी धीरे धीरे उनके साथ जुड़ते चले गये।बासुदेव बेसरा,कृत्यानन्द सिंह,कृष्ण केवट,गोपाल दास मुखर्जी,जयेन्द्र,भूजेन्द्र आरत, अशोक कुमार वर्णवाल, सुमन सूरो, हरगौरी प्रसाद सिन्हा,रमाशंकर साह,एखलाक अहमद खाँ,विश्वनाथ यादव,चन्द्राणी प्रसाद, विनय शरण,व्रजकिशोर पाठक,हीरानन्द सिंह हीरा,पंकज साहा,प्रदीप पल्लव,डोमन प्रसाद भगत,कमल नाथ आचार्य,सुरेश्वर
नाथ,दिनेश नारायण वर्मा,विश्वनाथ हांसदा,दिलीप कुमार सेन,राम वरण चौधरी,शौकत अली,शीलघर सिंह,
मोहनानन्द मिश्र,बैकुणठ नाथ झा,अशोक सिंह अकेला,सुधीर कुमार राय,हरिहर साह,आनन्द मोहन तिवारी,ए.के.वाजपेयी,के.के.लाल, हरिराम भैया,यू.एस.आनन्द,शैलेन्द्र कुमार सिन्हा, विनय चेतन,अमरेन्द्र सिन्हा,महेश पंडित, संतोष कुमार आर्य,आर.के.नीरद,डोमन साहु समीर, तेज नारायण प्रसाद कुशवाहा,रविकान्त सुमन,राजीव विनायक,रामशंकर साह, मुरलीधर झा, के.बी. सहाय,किशुन प्रसाद भगत,संदीप कुमार,निर्मला पुतुल,राजकिशोर मेहरा आदि सैकड़ों बुद्धिजीवी उनके निकटतम सहयोगी हो गये। इस प्रकार दुमका दर्पण काफी लोकप्रिय हो गया और इसकी लोकप्रियता में उनके द्वारा लिखा जाने वाला सम्पादकीय के अलावा “बुचिया की माई का पत्र बुचिया के बाबु के नाम” आदि स्थायी स्तम्भों का महत्वपूर्ण योगदान था। वस्तुत: दुमका दर्पण के प्रवेशांक से पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके द्वारा शुरू किया गया अभियान कभी रूका नहीं क्योंकि वे आम लोगों की समस्याओं पर निर्भीक टिप्पणी करते रहे और राज्य और केन्द्रीय सरकार को इससे अवगत कराते रहे। उन्होंने प्रवेशांक में दुमका में “प्रतीक्षातुर दुमका वासियों का रेल मंत्री से एक ही सवाल ! रेल कब आ रही है ?” विषयक सम्पादकीय लिखा और प्रमंडल में इसकी आवश्यकता स्पष्ट की(15 अगस्त 1978) । दुमका में हुए प्रथम पत्रकार सम्मेलन की उन्होंने जबरदस्त रिपोर्टिंग की (30 नवम्बर-15 दिसम्बर1978) और अधिकारियों की सूचनाओं की समीक्षात्मक विवेचना की। वर्ष 2006 (24-31मार्च) में उन्होंने संताल परगना की प्राचीनतम जनजाति पहाड़ियों की समस्याओं पर सम्पादकीय लिखा और जनजातीय विकास की खामियों को उजागर किया।
संताल परगना को प्रमंडल बनाने के बाद हुए भ्रष्टाचार और फैली अव्यवस्था और प्रशासनिक खर्च में हुए अत्यधिक इजाफा पर भी उन्होंने जबरदस्त चोट की थी। (अपनी बात-आधी सदी की आजादी का सच 8-15 सितम्बर1999,पृ.2,दुमका दर्पण)। उन्होंने 15 नवम्बर 2000 को झारखंड के गठन पर उन्होंने बड़ी मौलिक टिप्पणी की और इस हेतु 70 वर्षों के संघर्ष की वास्तविकताओं को उजागर किया। यह उनकी निर्भीक पत्रकारिता का एक सुन्दर और प्रेरक प्रसंग है।(अपनी बात-झारखंड की बागडोर(16-23 सितम्बर, 2000,पृ.2), नयी यात्रा की डगर,8-15 अक्टूबर 2001,पृ.2,दुमका दर्पण)। यह भी उनके अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि संताल परगना से सम्बन्धित विभिन्न विषयों के अलावा संताल परगना का इतिहास,राष्ट्रीय आन्दोलन,स्वतंत्रता सेनानी,सरकारी योजनाएं और इनका कार्यावन्यन, जनजातीय और आम लोगों की समस्याएं,पर्यावरण ह्यास,झारखंड आन्दोलन,आदिवासी साहित्य,कला व संस्कृति का विकास,प्रमंडल में रेल परिचालन की अवश्यकता, बिजली,पानी व सड़क परिवहन की समस्या आदि अनेक विषयों के ऐतिहासिक अध्ययन हेतु दुमका दर्पण एक प्रामाणिक रुाोत के रूप में प्रख्यात हो गया है। 28 मार्च 2006 को मधुजी के निधन से संताल परगना में पत्रकारिता के एक युग की इतिश्री हो गयी। एक सम्पादक और प्रकाशक के रूप में मधुजी की ईमानदारी, स्वतंत्रता,सजगता और निर्भीकता आज भी प्रेरक और प्रासंगिक है।
प्रस्तुति :- डॉ सिकंदर कुमार ,दुमका







