राज्य मे अब तक छह पत्रकारों की हुई है कोरोना से मौत

(झारखण्ड देखो/प्रतिनिधि)
दुमका: राज्य में कोरोनावायरस की महामारी से जूझते हुए छह पत्रकारों की मौत असामायिक हो गई है पर राज्य की अंतिम व्यक्ति तक विकास का वादा करने वाली झारखंड सरकार ने इस संबंध में एक भी शब्द नहीं कहा है।ऐसे में साफ शब्दों में कहा जा सकता है कि इस गंभीर समय में पत्रकार भाई उपर वाले के सहारे ही जी रहे हैं। राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं की बात हो या जिला प्रशासन की पत्रकारों की पूरी टीम उसे जन जन तक पहुंचाने का काम अपने अखबारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से पल भर में पहुंचाने का काम कर देते हैं। लेकिन जब पत्रकारों की सुविधा देने के संबंध में कोई मांग की जाती है तब यही सरकार चुप्पी साध लेती है। चुनाव के वक्त हर दिन राज्य के मुख्यमंत्री सहित अन्य नेता पत्रकार वार्ता करते हैं पर जब पत्रकारों के हितों की बात उठाई जाती है तभी यही नेता मौन धारण कर लेते हैं। यहां बताते चलें कि छोटी-छोटी बातों पर ट्वीट कर प्रतिक्रया व्यक्त करने वाले और दुमका के विधायक बसंत सोरेन और जामा के विधायिका सिता सोरेन की चुप्पी पर भी पत्रकार समाज हैरान हैं। एक तरफ जहां अधिकतर राज्य सरकारों ने पत्रकारों को कोरोना वारियर्स के रूप में चिह्नित कर उन्हें राहत प्रदान की है वहीं दूसरी ओर झारखंड सरकार ने सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए उनके परिजनों को सांत्वना तक देने में परहेज कर रही है। ऐसा किस विचारधारा के तहत किया जा रहा है यह तो सरकार और उनके कारिंदे ही समझे। गौरतलब है कि आल इंडिया स्माल एंड मीडियम जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन के दुमका जिला अध्यक्ष विनोद सारस्वत ने राज्य सरकार से झारखंड में कार्यरत सभी पत्रकारों को सरकारी कर्मचारियों की तरह पचास लाख रूपए का बीमा देने की आवाज उठाया है पर इसका असर सरकार पर पड़ता नहीं दिख रहा है। एसोसिएशन के विनोद सारस्वत ने सरकार से पुनः मांग की है कि झारखंड में कार्यरत सभी पत्रकारों को कोरोना योद्धा के रूप में स्वीकार कर शहीद हुए पत्रकारों को पचास लाख रुपए और एक व्यक्ति को नौकरी प्रदान कर उनके हितों का ख्याल करें। झारखंड में एसोसिएशन लगातार सरकार से पत्रकारों को सुरक्षा और सुविधा देने की आवाज उठाने का कार्य कर रही है पर इसका कोई असर सरकार पर नहीं हो रही है। ऐसा क्यों हो रहा है यह तो समझ से परे है पर अगर राज्य के मुख्यमंत्री ने जल्द ही कोई निर्णय नहीं लिया तो पत्रकारों को एकजुट हो कर वाद्य होकर आंदोलन करने पर मजबूर होना पड़ेगा।








