भैया हसदक ‘चासा’ की स्मृति में भव्य आयोजन, मातृभाषा से जुड़ाव बनाए रखने का आह्वान
दुमका: सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में संथाली भाषा एवं साहित्य के उत्थान को लेकर एक भव्य एवं अत्यंत महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह आयोजन सुप्रसिद्ध संताली साहित्यकार भैया हसदक ‘चासा’ की विशेष स्मृति को समर्पित रहा, जिसमें भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन पर व्यापक चर्चा की गई।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में झारखण्ड के विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रविन्द्र नाथ महतो, अति विशिष्ट अतिथि दुमका सांसद नलिन सोरेन एवं विशिष्ट अतिथि जामा विधायक डॉ. लुईस मरांडी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. राम कुमार सिंह ने की।कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार लोटा-पानी से अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। इसके पश्चात सभी अतिथियों को पारंपरिक नृत्य, ढोल एवं गीत के साथ सम्मानपूर्वक मंच तक लाया गया। दीप प्रज्वलन, भैया हसदक ‘चासा’ के चित्र पर माल्यार्पण, राष्ट्रीय गीत एवं कुलगीत के साथ कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन हुआ।इसके उपरांत अतिथियों को पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र एवं स्मृति-चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। स्वागत भाषण स्नातकोत्तर संथाली विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सुशील टुडू द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर भैया हसदक ‘चासा’ की स्मृति पर आधारित विशेष स्मारिका का विमोचन भी किया गया। विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. राजीव रंजन शर्मा ने अपने संबोधन में संथाली साहित्य के ऐतिहासिक विकास, उसके उत्थान एवं वर्तमान परिदृश्य पर विस्तृत चर्चा की तथा भैया हसदक ‘चासा’ के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
डीएसडब्ल्यू डॉ. जैनेंद्र यादव ने अपने वक्तव्य में संथाली भाषा को हमारी संस्कृति एवं परंपराओं से जोड़ने वाली सशक्त कड़ी बताया। उन्होंने संताली साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित करते हुए विशेष रूप से रघुनाथ मुर्मू के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय यूजी, पीजी एवं पीएचडी स्तर पर संथाली अध्ययन के साथ-साथ ‘संथाल कल्चरल स्टडी’ और संथाली स्पोकन कोर्स के माध्यम से भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है।दुमका जिला परिषद अध्यक्ष जॉयस बेसरा ने अपने संबोधन में वर्तमान समय में संथाली भाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि समाज में इसकी समझ और उपयोगिता निरंतर बढ़ रही है।डॉ. लुईस मरांडी ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए 11 अप्रैल के दिन को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि संथाली साहित्य दिवस एवं सिदो-कान्हु जयंती का एक साथ होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सुझाव दिया कि भैया हसदक ‘चासा’ के योगदान को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए तथा संथाली साहित्य परिषद के गठन पर भी विचार किया जाए।नलिन सोरेन ने अपने वक्तव्य में संथाली भाषा एवं साहित्य को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहकर ही हम अपनी पहचान बनाए रख सकते हैं। उन्होंने यह चिंता भी व्यक्त की कि संथाल परगना के सभी महाविद्यालयों में संथाली विषय की पढ़ाई उपलब्ध नहीं है, जिसके लिए प्रयास किए जाने चाहिए।मुख्य अतिथि डॉ. रविन्द्र नाथ महतो ने अपने संबोधन में मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आज हम अपनी जड़ों और भाषा से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाषा, संस्कृति और अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़े हैं, और इनके संरक्षण के बिना समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि झारखंड विधानसभा की कार्यवाही को आठ स्थानीय भाषाओं में प्रसारित करने का प्रयास किया गया है, जिसमें संथाली भाषा भी शामिल है।उन्होंने संथाली साहित्य के संरक्षण एवं विस्तार के लिए इसके अन्य भाषाओं में अनुवाद की आवश्यकता पर बल दिया तथा सरकार द्वारा शिक्षा को सुलभ बनाने हेतु चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने छात्रों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि यदि वे पढ़ना चाहते हैं तो सरकार हर संभव सहयोग प्रदान करने के लिए तत्पर है। साथ ही संथाल परगना को एक शैक्षणिक हब बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।अध्यक्षीय भाषण में प्रभारी कुलपति प्रो. राम कुमार सिंह ने आपसी समन्वय एवं सहयोग से संथाली भाषा-साहित्य के विकास पर बल दिया। उन्होंने आधुनिक तकनीक, विशेषकर एआई के उपयोग से भाषा के संरक्षण एवं प्रसार की आवश्यकता बताई तथा विभिन्न भाषाओं में अनुवाद को प्रोत्साहित करने की बात कही। प्रथम सत्र के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शर्मिला सोरेन द्वारा किया गया।कार्यक्रम के द्वितीय सत्र (साहित्यिक सत्र) की शुरुआत सामूहिक नृत्य एवं गीत के साथ हुई। इस सत्र में ठाकुर प्रसाद मुर्मू, मुलमिन टुडू, प्रो. प्रमोदनी हसदक, बिजय टुडू, श्रीमती मरांगमयी मुर्मू, मसूदी टुडू सहित अन्य विद्वानों एवं साहित्यकारों ने संथाली भाषा-साहित्य के इतिहास, वर्तमान स्थिति, युवा दृष्टिकोण, लोकगीतों की भूमिका तथा ध्वनि-विज्ञान जैसे विषयों पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए।छात्र-छात्राओं द्वारा संताली कविता पाठ, समूह एवं एकल नृत्य तथा संगीत की आकर्षक प्रस्तुतियाँ दी गईं, जिसने कार्यक्रम को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की।कार्यक्रम का समापन डॉ. अमित मुर्मू के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। मंच संचालन डॉ. निर्मल मुर्मू ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में विभागाध्यक्ष डॉ. सुशील टुडू, सहायक प्राध्यापक डॉ. शर्मिला सोरेन, डॉ. अमित मुर्मू, डॉ. निर्मल मुर्मू सहित शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों—रमेश मरांडी, उपेंद्र मरांडी, राजेंद्र मरैया, आनंद हेम्ब्रम, दिलीप कुमार टुडू, सुमित्रा मुर्मू, प्रेमलता आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के विभिन्न स्नातकोत्तर विभागों के शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।यह आयोजन संथाली भाषा एवं साहित्य के संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सराहनीय पहल के रूप में सामने आया।
दुमका से डॉ सिकन्दर कुमार की रिपोर्ट








