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संताल विद्रोह 1855-1856 की वैज्ञानिक विवेचना के इतिहासकार डॉ दिनेश नारायण वर्मा

हूल दिवस पर विशेष

लेखक  : डॉ सिकंदर कुमार ,दुमका (झारखण्ड)

झारखण्ड देखो डेस्क :जनजातीय इतिहास,सभ्यता और संस्कृति पर शोध करने वाले विद्वानों में झारखंड के डा.दिनेश नारायण वर्मा (जन्म-टाटानगर (जमशेदपुर)झारखंड) एक प्रख्यात इतिहासकार हैं।

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बिकानेर और राजगढ (राजस्थान) में हुई। उन्होंने पटना वि.वि. (पटना,बिहार) से स्नातकोत्तर (इतिहास 1973-1975) की डिग्री प्राप्त की और भागलपुर वि.वि.,भागलपुर (बिहार)से प्रो.डा. एस.एम.हबिबुद्दीन के निर्देशन में “द रोल ऑफ ट्राइब्स ऑफ छोटानागपुर एण्ड संताल परगना इन द रिवोल्यूशन ऑफ 1942 ” विषय पर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सफतलापूर्वक शोध कार्य पूरा किया और डाक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किये गये (1991)। एक व्यक्तिगत साक्षात्कार में इतिहासकार वर्मा ने कहा कि झारखंड पर प्रकाशित अधिकांश पुस्तकों में संताल परगना की उपेक्षा की गई। वर्ष 2000 में इसका गठन होने के बाद भी प्रकाशित पुस्तकों में संताल परगना उपेक्षित ही रहा। इसलिए उनके शोध का मुख्य विषय संताल परगना का इतिहास,सभ्यता और संस्कृति है। इन विषयों पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें शामिल राजमहल (राजमहल का इतिहास 1990) और पहाड़िया जनजाति का संक्षिप्त इतिहास (1993) आदि पुस्तकें मुख्य हैं। प्रो सुरेश्वर नाथ (साहिबगंज) के साथ प्रोफेसर वर्मा के द्वारा लिखी ये दोनों पुस्तकें स्नातकोत्तर इतिहास के सिलेबस में अनुमोदित हैं।  

     संताल विद्रोह 1855- 1856 पर अलग अलग दृष्टिकोण से प्रकाशित (2002–2017)  अपनी पाँच पुस्तकों में इतिहासकार वर्मा ने इसकी व्यापक विवेचना की और उन प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों  की समीक्षा प्रस्तुत की जिस पर इतिहासकारों ने ध्यान नहीं दिया था। वास्तव में डा. वर्मा उन इतिहासकारों में अग्रणी हैं जिन्होंने संताल विद्रोह पर हिन्दी में पुस्तकें लिखीं। शोधक (जयपुर,राजस्थान),वन्यजाति (नयी दिल्ली) आदि शोध पत्रिकाओं के अलावा विभिन्न दैनिक और साप्ताहिक समाचार पत्रों में भी संताल विद्रोह पर उनके कई शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस (नयी दिल्ली),बिहार इतिहास परिषद (मुजफ्फपुर, बिहार),विभिन्न राष्ट्रीय और अन्तरर्राष्ट्रीय  सेमिनारों,गोष्ठियों आदि में उन्होंने संताल विद्रोह की समीक्षात्मक विवेचना प्रस्तुत की और कहा कि इतिहासकारों द्वारा इसके जनसांख्यकीय संगठन,स्वरूप,उद्घोषों,युद्धनीति,युद्ध कौशल आदि पर ध्यान नहीं दिया जाना काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। शांति निकेतन विश्व भारती (बोलपुर,पश्चिम बंगाल) में सम्पन्न इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के 66वें अधिवेशन में उन्होंने पाश्चात्य इतिहासकारों की संताल विद्रोह सम्बन्धी साम्राज्यवादी दृष्टिकोण की जबर्दस्त आलोचना की और इसे प्रामाणिक व वैज्ञानिक  ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत बताया। संताल विद्रोह पर अपने विस्तृत  शोध अध्ययन  में उन्होंने इस ऐतिहासिक घटना को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया और पहली बार बताया कि संताल विद्रोह भारत की पहली जनक्रान्ति ही नहीं बल्कि एशिया महादेश का सबसे बड़ा जन आन्दोलन भी था। 30 जून 2007 को दैनिक जागरण (भागलपुर,पृ.17) में प्रकाशित लेख में वैश्विक परिप्रेक्ष्य में इसकी विवेचना करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे बंगाल, बिहार और झारखंड ही नहीं बल्कि पूरा भारत प्रभावित हुआ और विश्व स्तर पर लोगों को संताल परगना के आदिवासियों,पिछड़ों और दलितों की संगठन शक्ति,नेतृत्व क्षमता और उनके स्वतंत्रता प्रेमी होने का पहली बार आभास हुआ। नार्वे,डेनमार्क,इंगलैंड,स्काटलैंड, अमेरिका आदि देशों में इसकी चर्चा हुई और संतालों के प्रति विशेष दृष्टिकोण अपनाया गया।  संताल विद्रोह पर उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण और लेखन से प्रभावित देवघर,राँची आदि की अनेक सामाजिक- शैक्षणिक संस्थाओं ने डा. वर्मा को संताल विद्रोह विषयक अभिभाषण के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया। अम्बेडकर विचार मंच,देवघर द्वारा 7 जुलाई 2017 को संताल विद्रोह पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर इसके मुख्य वक्ता के रूप में डा.वर्मा ने इस ऐतिहासिक घटना की उत्पत्ति,प्रचार-प्रसार, इसके दूरगामी प्रभावों की प्रामाणिक विवेचना की और इसकी ऐतिहासिक विशिष्टाओं को स्पष्ट किया जिस पर  इतिहासकारों ने ध्यान नहीं दिया था। उन्होंने संताल विद्रोह के महानायकों सिदो और कान्हू के महान व्यक्तित्व और विदेशी शासन के खिलाफ धरतीपुत्रों को एकजुट करने में उनकी ऐतिहासिक योगदान की समीक्षात्मक विवेचना प्रस्तुत की। सोशल मीडिया में उनके अभिभाषण का विडियो भी जारी किया गया।    

     डा.वर्मा की संताल विद्रोह पर पहली रचना (संताल विद्रोह-1855-1856 के अमर नायक वीरवर सिदो और कान्हू) वर्ष 2002 में प्रकाशित हुई (द्वितीय संशोधित संस्करण 2013)।  इस रचना में लेखक ने सिदो और कान्हू के व्यक्तित्व का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया और 19वीं शताब्दी में भारत में ब्रिाटिश शासन के खिलाफ हुए विद्रोहों में संताल विद्रोह को सबसे अधिक संगठित और सशक्त विद्रोह बताया। इस रचना में उन्होंने संताल विद्रोह की  ऐतिहासिक विशिष्टताओं की संक्षिप्त विवेचना की  और इसके धरातलीय स्वरूप व जनसांख्यकीय संगठन को पहली बार स्पष्ट किया। उन्होंने संताल परगना के क्षेत्रीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संताल विद्रोह का ऐतिहासिक मूल्यांकन किया और इसके दूरगामी व स्थायी प्रभावों को रेखांकित किया। उनके अनुसार 1833 ई.में दामिन-इ-कोह के गठन के बाद  संताल विद्रोह संताल परगना के  जनजातीय इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी। इसके बावजूद तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी (1848-1856) ने संताल विद्रोह को एक स्थानीय बगावत कहा और इसके ऐतिहासिक महत्व को उपेक्षित करने की कोशिश की। पर डा.वर्मा ने अपने व्याख्यानों और रचनाओं में गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी के साम्राज्यवादी दृष्टिकोण का खंडन किया और प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर  इसके जमीनी स्वरूप को पहली बार उजागर किया। संताल विद्रोह के इतिहास-लेखन में इतिहासकार वर्मा के मौलिक योगदानों में यह शीर्ष पर है।  अपनी दूसरी रचना “संताल विद्रोह 1855-1856-इतिहास और इतिहास- लेखन
“(2007) में इतिहासकार वर्मा ने ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में संताल विद्रोह की व्यापक वैज्ञानिक विवेचना की और लिखा कि संताल विद्रोह भारत की पहली जनक्रान्ति ही नहीं बल्कि एशिया महादेश का सबसे बड़ा जन आन्दोलन भी था।इस पुस्तक का आमुख इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग,डा.राम मनोहर लोहिया वि.वि.,फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के  प्रो राम आधार पाण्डेय ने लिखा और इसे मौलिक कृति बताते हुए लेखक के प्रयास की प्रशंसा की। सिदो कान्हू मुर्मू वि.वि.के तत्कालीन प्रति कुलपति  प्रो.डा.अरविन्द कुमार ने रचना को संताल विद्रोह के वैज्ञानिक अध्ययन में मील का पत्थर बताया और लेखक के प्रयास की बड़ी तारीफ की। संताल विद्रोह पर हिन्दी में पहली पुस्तक लिखने के लिए प्रो.कुमार ने लेखक को अपनी शुभकामनाएं दीं और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। इसी बीच डा.वर्मा प्रभारी प्राचार्य  बने और बी.एस.के.कालेज(बरहरवा) के चौतीस वर्षों के इतिहास में पहली बार कालेज में बड़े पैमाने पर ‘हूल जयंती’ (30 जून 2012) मनायी गयी। इस अवसर पर आयोजित भव्य शानदार समारोह की अध्यक्षता झारखंड प्रदेश सरकार के मंत्री हेमलाल मुर्मू ने की और इतिहासकार वर्मा के संताल विद्रोह पर इतिहास-लेखन की प्रशंसा की। इसके पूर्व वर्ष 2008 और 2010 (30 जून 2008/2010,भारतमित्र,कोलकाता) में प्रकाशित अपने दो आलेखों में इतिहासकार वर्मा ने संताल विद्रोह के जनसांख्यकीय संगठन की विवेचना की और इससे सम्बन्धित प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्यों की समीक्षा प्रस्तुत की।    

संताल विद्रोह पर इतिहासकार वर्मा ने अपनी तीसरी पुस्तक “संताल विद्रोह 1855-1856-जनजातियों,दलितों और पिछड़ों का मुक्ति संघर्ष “(2014) में ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर एक नये दृष्टिकोण की विवेचना की और संताल विद्रोह को देश के जनजातियों,दलितों और पिछड़ों का पहला सशक्त, संगठित और सशस्त्र मुक्ति संघर्ष बताया और धरती पुत्रों की युद्धनीति और युद्ध कौशल की प्रशंसा की। इसकी ऐतिहासिक विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने  यह जानकारी दी कि संताल विद्रोह ने देश में पहली बार साम्प्रदायिक एकता की नींव डाली और इसकी मजबूत ताकत से भारतीयों को अवगत कराया। यह पहली बार था कि जनजातियों,दलितों और पिछड़ों के साथ  मोमिन समुदाय (मुस्लिम समाज) के लोग भी विदेशी ताकत के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष में शामिल हुए जिन्होंने एक साथ मिलकर विदेशी शासन का जबर्दस्त प्रतिरोध किया । इसने धर्म और जाति के बन्धनों को तोड़ दिया और उनमें भाई-भाई का आपसी सम्बन्ध काफी मजबूत हो गया जिसने अविभाजित बंगाल के एक बड़े इलाके में ईस्ट इंडिया कम्पनी शासन की नींव हिला दी। यद्यपि सत्ता,शक्ति और शस्त्र के बल पर इस जनक्रान्ति का कठोरतापूर्वक दमन कर दिया गया पर इस विद्रोह का आजादी का ऐतिहासिक संदेश शीघ्र ही पूरे देश में प्रचारित- प्रसारित हो गया जिसने देश में स्वतंत्रता आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त कर दिया।  

वर्ष 2015 में प्रकाशित संताल विद्रोह पर अपनी चौथी पुस्तक “संताल विद्रोह 1855-1856-पाश्चात्य लेखक और साम्राज्यवादी इतिहास-लेखन” में इतिहासकार वर्मा ने इ.जी.मैन (1867),डब्ल्यू.डब्ल्यू.हन्टर (1868,1877,1895),एफ.बी.ब्रोडले-बर्ट (1905), एच.मैकफर्सन (1909) और एल.एस.एस. ओ’ मैली (1910) आदि पाश्चात्य लेखकों की साम्राज्यवादी  नजरिये का जोरदार शब्दों में खंडन किया और ऐतिहासिक दस्तावेजों की विवेचना करते हुए यह स्पष्ट किया कि संताल विद्रोह हिन्दू जमींदारों,महाजनों के ही खिलाफ नहीं था बल्कि यह स्वाभाविक रूप से विदेशी शासन के खिलाफ था क्योंकि इसके नायक और उनके हजारों सहयोगी विदेशी शासन से मुक्त होकर अपना राज स्थापित करना चाहते थे। भारत में साम्राज्यवादी इतिहास-लेखन की समीक्षात्मक  विवेचना कर इतिहासकार वर्मा ने कहा कि इस तरह के आपत्तिजनक लेखन इसकी अन्तर्निहित खामियों और प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों की इरादतन उपेक्षा से  देश का भारी नुकसान हुआ क्योंकि इससे ऐतिहासिक घटनाओं की सत्यता पर पर्दा पड़ गया। उनके अनुसार इसका उदभेदन आवश्यक था । इसलिए पाश्चात्य लेखकों की साम्राज्यवादी नजरिये के विपरीत डा. वर्मा ने स्पष्ट किया कि  विदेशी शासन का प्रतिरोध करने वालों ने अपनी एकजूटता और संयुक्त गठबन्धन बना कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिये थे और छह महीनों से ज्यादा समय तक अपने पारम्परिक हथियारों से संघर्ष कर अपनी आजादी के लिए उन्होंने कुर्बानियां दीं और कहीं कभी आत्मसमर्पण नहीं किया।  सिदो कान्हू मुर्मू वि.वि. के तत्कालीन प्रति-कुलपति प्रो.डा.सत्यनारायण मुण्डा ने इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखा और टिपण्णी की कि ऐसे विषयों पर विद्वानों और इतिहासकारों ने ध्यान नहीं दिया जिससे इस तरह के अधिकांश विषय अछूते रह गये थे इसलिए लेखक का प्रयास काफी प्रशंसनीय है। इसी वि.वि.में स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. सुरेश्वर नाथ और प्रो.डा.सुरेश प्रसाद सिंह (साहिबगंज महाविद्यालय के भूतपूर्व प्रिंसिपल) ने भी डा.वर्मा के प्रयासों की सराहना की और संताल विद्रोह पर लिखी उनकी पुस्तकों की मौलिकता की प्रशंसा की।  

  झारखंड प्रदेश के पूर्व डी.आई.जी. सिदो हेम्ब्रम  (अम्बेडकर विचार मंच, देवघर,के प्रसिडेंट) को समर्पित संताल विद्रोह पर अपनी पाँचवीं पुस्तक “संताल विद्रोह 1855-1856- भारतीय लेखक और राष्ट्रवादी इतिहास-लेखन” में इतिहासकार वर्मा ने भारत में राष्ट्रवादी इतिहास-लेखन को रेखांकित किया और बाबू दिगम्बर चक्रवर्ती,के.के.बसु, कालीकिंकर दत्त,पी.सी.राय चौधरी,एल.नटराजन,बी.राघवइया,गौरीहर मित्र  आदि भारतीय लेखकों राष्ट्रवादी लेखन की समीक्षा प्रस्तुत की। तिलका मांझी भागलपुर वि.वि.,भागलपुर (बिहार)के पूर्व कुलपति प्रो.क्षेमेन्द्र कुमार सिंह (पूर्व अध्यक्ष,आई.आर.पी.एम.विभाग,अम्बेडकर एवं समाज कार्य विभाग,संकायाध्यक्ष,समाज विज्ञान) ने इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखा और कमेंट किया कि “जनजातीय इतिहास और संस्कृति पर पुस्तक-लेखन का कार्य थोड़ा कठिन रहा है,इसलिए संताल विद्रोह पर लेखक की अद्यतन रचना उनकी एक बड़ी शैक्षणिक उपलब्धि है। लेखक ने संताल विद्रोह पर भारतीय इतिहासकारों के विचारों को ही संकलित नहीं किया बल्कि उनके विचारों की समीक्षा कर संताल विद्रोह के इतिहास-लेखन में उनके योगदान का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया।” ज्ञात हो कि साम्राज्यवादी लेखकों ने प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के विपरीत टीका-टिप्पणी की थी और देश की  पहली जन क्रांति को कोई महत्व नही दिया था। पर लेखक वर्मा ने यह स्पष्ट किया कि यह भारतीय लेखकों के प्रयासों का ही   फलाफल था कि संताल विद्रोह की साम्राज्यवादी व्याख्या धाराशायी हो गयी और देश-विदेश के लोग संताल विद्रोह की जमीनी हकीकत से अवगत हुए। इस प्रकार संताल विद्रोह की राष्ट्रवादी दृष्टिकोण  की समीक्षात्मक व्याख्या पर यह पहली मौलिक रचना है। लेखक  द्वारा की गई कथित भारतीय इतिहासकारों के दृष्टिकोणों की समीक्षात्मक विवेचना बड़ी तार्किक और बेहद प्रभावशाली है। उनके द्वारा सम्बन्धित ऐतिहासिक तथ्यों का प्रस्तुतीकरण सुन्दर और शानदार है। संदर्भ ग्रंथों की सूची काफी बड़ी है जो रचना की मौलिकता के स्थायी प्रमाण और सूचक हैं। यह सम्बन्धित तथ्यों के संकलन हेतु लेखक के अविछिन्न प्रयास का द्योतक भी है। मजे की बात इस सम्बन्ध में यह है कि इतिहासकार वर्मा की  संताल विद्रोह पर कोई रचना सिदो कान्हू मुरमू वि.वि. के स्नातकोत्तर इतिहास के  पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है। सम्प्रति इतिहासकार वर्मा संताल विद्रोह पर अपनी छठी पुस्तक संताल हूल 1855- 1856 (संताल हूल1855- 1856 का जमीनी अध्ययन) की रचना में प्रयसरत्त हैं।अपनी विभिन्न पुस्तकों के अलावा  विभिन्न समाचार पत्रों के विशेष अंकों में भी इतिहासकार वर्मा ने संताल विद्रोह पर प्रकाशित अपने आलेखों में इसके विभिन्न पहलुओं पर व्यापक रूप से लिखा, इसका वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया और इस ऐतिहासिक घटना की ओर सभी वर्ग के लोगों का ध्यान भी आकर्षित किया। एक इतिहासकार के रूप में प्रो. वर्मा की यह एक बड़ी उपलब्धि है। बिहार इतिहास परिषद (मुजफ्फपुर, बिहार) के वार्षिक अधिवेशन(2011) में उन्होंने संताल विद्रोह के  गुमनाम लेखक बाबू दिगंबर चक्रवर्ती (पाकुड़,झारखंड) के संताल विद्रोह पर इतिहास- लेखन को उजागर किया और कहा कि बाबू दिगंबर चक्रवर्ती संताल विद्रोह पर लिखने वाले प्रथम भारतीय लेखक थे और उनका लेखन संताल विद्रोह का पहला लिखित प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज है। उन्होंने विभिन्न वर्गों के अलावा संताल हूल में पहाड़िया जनजाति के सक्रिय और व्यापक योगदान का प्रामाणिक विवरण लिखा और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में बताया कि संताल विद्रोह के नायक सिदो और कान्हू केवल संतालों के ही नहीं बल्कि सभी   जनजातियों,पिछड़ों और दलितों के सर्वमान्य लोकप्रिय नेता थे।  इस प्रकार प्रो.वर्मा ने संताल विद्रोह के वैज्ञानिक अध्ययन और इतिहास-लेखन को प्रोत्साहित किया।    

2 Comments

  • Rabindranath Mahto
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    मैंने संताल जनजाति के संबंध में एक पुस्तक लिखी है – संताल इतिहास ( हिहिड़ी पिपिड़ी से आज तक ) । आप डाक का पता उपलब्ध करायें तो समीक्षा के लिए एक प्रति भेजने का ईच्छुक हूं ।
    फिलहाल पहाड़िया इतिहास के बारे में एक पुस्तक लिख रहा हूं । अगर आप कुछ सहायता कर सकते हैं तो आभारी रहूंगा ।

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